11 प्रत्यावर्ती धारा || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 11 notes in Hindi
अध्याय 11 प्रत्यावर्ती धारा विज्ञान कक्षा 12 || Alternating Current
Unit – 4 विद्युत चुम्बकीय प्रेरण तथा प्रत्यावर्ती धाराएँ
अध्याय 11 प्रत्यावर्ती (Alternating Current)
अध्याय 11 प्रत्यावर्ती में हम किन विषयों के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे?
- चुम्बकीय क्षेत्र में अपनी अक्ष के परितः घूमती कुंडली के सिरों के बीच प्रेरित विद्युत वाहक बल अथवा प्रत्यावर्ती वोल्टेज
- प्रत्यावर्ती वोल्टता तथा धारा के बीच सम्बन्ध में कुछ परिभाषाएं
- महत्तम मान या शिखर मान या आयाम
- आवर्तकाल
- आवृत्ति
- तात्क्षणिक मान
- प्रत्यावर्ती धारा का माध्य अथवा औसत मान
- प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान
- प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में वोल्टेज V तथा धारा i के बीच कलांतर
- कला समंजक तथा कला आरेख
- विभिन्न प्रकार के प्रत्यावर्ती धारा परिपथ
- जब परिपथ में केवल शुद्ध प्रतिरोध R है
- जब परिपथ में केवल स्व प्रेरकत्व L है
- प्रेरण प्रतिघात
- जब परिपथ में केवल धारिता C है
- धारितीय प्रतिघात
- प्रतिबाधा
- जब परिपथ में धारिता C तथा प्रतिरोध R दोनों श्रेणीक्रम में हैं
- जब परिपथ में प्रेरकत्व L तथा धारिता C श्रेणीक्रम में हैं
- जब परिपथ में प्रेरकत्व L
- धारिता C तथा प्रतिरोध R श्रेणीक्रम हैं
- प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में शक्ति अथवा सामर्थ्य
- जब परिपथ में केवल शुद्ध प्रतिरोध है
- जब परिपथ में प्रतिरोध तथा प्रेरकत्व दोनों हैं
- शक्ति गुणांक
- वाटहीन धारा
- चोक कुंडली
- श्रेणीबद्ध LCR अनुनादी परिपथ
- प्रत्यावर्ती धारा जनित्र अथवा डायनमो
- ट्रांसफार्मर
- प्रत्यावर्ती धारा की दिष्ट धारा की तुलना में उपयोगिता।
अध्याय 10 विद्युत चुम्बकीय प्रेरण से संबंधित सभी महत्वपूर्ण में Topic पर High Quality Notes in Hindi.
धारा (Current) :-
किसी चालक में विद्युत आवेश के प्रवाह की दर को धारा (current) कहते हैं। या विद्युत आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं।
धारा के प्रकार (Types of Electric Current) :-
धारा दो प्रकार की होती है (1) दिष्ट धारा (2) प्रत्यावर्ती धारा।
(1) दिष्ट धारा (Direct current) —किसी परिपथ में बहने वाली वह विद्युत धारा जिसका समय के साथ मान (परिमाण) और दिशा नहीं बदलती है, दिष्ट धारा कहलाती है। सेल या बैटरी से प्राप्त धारा दिष्ट धारा होती है।
(2) प्रत्यावर्ती धारा (Alternating current) —किसी परिपथ में बहने वाली वह धारा जिसका समय के साथ परिमाण और दिशा आवर्त रूप से बदलती रहती है, प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है। प्रत्यावर्ती धारा विद्युत जनित्र अथवा डायनेमो से प्राप्त होती है।
यदि किसी चालक की अनुप्रस्थ काट में t सेकंड में q आवेश प्रवाहित हो तो
i=q/t ,{विद्धुत धारा= आवेश/समय } ⇒ q= it Note : धारा (current) को धकेलने वाले को वोल्टेज तथा धारा को रोकने वाले को प्रतिरोध कहते हैं।विद्युत जनित्र अथवा प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (डायनेमो) (Electric Generator or Alternating Current Generator (Dynamo)) :-
विद्युत जनित्र अथवा प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (डायनमो) एक ऐसा यंत्र होता है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र के प्रकार (Types of Alternating Current Generators) :-
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र दो प्रकार के होते हैं (1) प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (2) दिष्ट धारा जनित्र।
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र डायनमो (Alternating Current Generators (Dynamo)) :-
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र या डायनमो एक ऐसा यंत्र होता है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
डायनमो का सिद्धांत (Principle of Dynamo)
विद्युत जनित्र अर्थात डायनमों में एक बंद कुण्डली ABCD होती है। जिसको प्रबल चुंबकीय ध्रुवों के बीच रखकर उसके अक्ष के परितः तेजी से घुमाया जाता है तो कुण्डली से गुजरने वाले चुंबकीय फ्लक्स रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है। जिसके कारण कुण्डली में एक प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है और परिपथ में प्रेरित धारा बहने लगती है। इस प्रकार डायनमो में कुण्डली को घुमाने में व्यय यांत्रिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा में बदल जाती है।
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (डायनमो) की संरचना (Structure of an Alternating Current Generator (Dynamo))
इसके निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं।(1) क्षेत्र चुंबक (Field Magnet)
यह एक नाल के आकार का शक्तिशाली चुंबक होता है। जिसके N व S क्रमशः उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव होते हैं।
(2) आर्मेचर कुण्डली (Armature Coil)
यह एक आयताकार कुण्डली ABCD होती है जो लोहे की क्रोड पर तांबे के तार को लपेटकर बनाई जाती है। इसे आर्मेचर कुण्डली कहते हैं।
(3) सर्पी वलय (Sliding Ring)
आर्मेचर कुण्डली के दोनों सिरे दो अलग-अलग छल्लों S1 व S2 से जुड़े होते हैं, जिन्हें सर्पी वलय कहते हैं। ये सर्पी वलय आर्मेचर कुण्डली के साथ-साथ घूमते रहते हैं।
(4) ब्रुश (Brush)
सर्पी वलय ग्रेफाइड या तांबे की बनी दो पत्तियों को सदैव स्पर्श करते रहते हैं। इन पत्तियों को ब्रुश कहते हैं। यह ब्रुश स्थिर रहते हैं जबकि सर्पी वलय इन पर फिसलते हुए घूमते हैं।
डायनमो की कार्यविधि (Working of Dynamo)
जब आर्मेचर कुंडली ABCD घूमती है तो कुंडली में से होकर जाने वाली चुंबकीय फ्लक्स रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है। जिसके फलस्वरुप कुंडली में विद्युत धारा उत्पन्न (प्रेरित) हो जाती है।
प्रत्यावर्ती धारा की दिशा (Direction of Alternating Current)
आर्मेचर कुंडली ABCD के लगातार घूमने के कारण परिपथ में धारा की दिशा प्रत्येक आधे चक्कर में बदलती रहती है। कुंडली के आधे चक्कर में धारा एक ओर तथा शेष आधे चक्कर में धारा विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। धारा की दिशा फ्लेमिंग के दाएं हाथ के नियम से ज्ञात की जा सकती है। कुंडली 1 सेकेंड में जितने चक्कर चक्कर लगाती है। उसे धारा की आवृत्ति कहते हैं। इस धारा को प्रत्यावर्ती धारा तथा धारा उत्पन्न करने वाले यन्त्र (जनित्र) को प्रत्यावर्ती धारा जनित्र कहते हैं।
ट्रांसफार्मर (Transformer) :-
ट्रांसफार्मर एक ऐसी युक्ति (साधन) है जिसके द्वारा प्रत्यावर्ती वोल्टेज को बढ़ाया या घटाया जाता है।
ट्रांसफार्मर अन्योन प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। ट्रांसफार्मर दिष्ट धारा के लिए उपयोगी नहीं होता है।
ट्रांसफार्मर के प्रकार (Types of Transformer) :-
ट्रांसफार्मर दो प्रकार के होते हैं (1) अपचायी ट्रांसफार्मर (2) उच्चाई ट्रांसफार्मर।
(1) अपचायी ट्रांसफार्मर (Step-down Transformer)
अपचायी ट्रांसफार्मर उच्च प्रत्यावर्ती वोल्टता को घटा देता है, किन्तु अपचायी ट्रांसफार्मर धारा की प्रबलता को बढ़ा देता है।
(2) उच्चायी ट्रांसफार्मर (Step-Up Transformer)
उच्चायी ट्रांसफार्मर निम्न प्रत्यावर्ती वोल्टता को बढ़ा देता है किन्तु उच्चायी ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती धारा की प्रबलता को कम कर देता है।
ट्रांसफार्मर का सिद्धांत (Principle of Transformer)
ट्रांसफार्मर अन्योन प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब निकट स्थित किन्हीं दो कुंडलियों में से किसी एक में प्रवाहित प्रत्यावर्ती धारा के मन में परिवर्तन करते हैं, तो दूसरी कुंडली से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स के मान में परिवर्तन होता है, और इस कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। यदि कुंडली का परिपथ पूर्ण है तो परिपथ में धारा प्रवाहित होने लगती है।
माना ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुंडली में फेरों की संख्या NS तथा द्वितीय कुंडली में फेरों की संख्या NS है। यदि प्राथमिक कुंडली के प्रत्येक फेरे से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स Φ हो, तो फैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत से —
प्राथमिक कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल e_P= 〖- N〗_P ∆ϕ/∆t ,समी(1) इसी प्रकार द्वितीय कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल e_s= - N_s ∆ϕ/∆t ,समी(2) समी(2) को समी(1) से भाग देने पर e_s/e_P =(- N_S ∆ϕ/∆t)/(- N_P ∆ϕ/∆t ) e_s/e_P =N_S/N_P ,समी(3)यदि प्राथमिक कुंडली का प्रतिरोध नगण्य हो तो प्रेरित विद्युत वाहक बल (EP) कुंडली के सिरों के बीच आरोपित प्रत्यावर्ती वोल्टता (VP) के बराबर होगा। इसी प्रकार द्वितीय कुंडली के लिए प्रेरित विद्युत वाहक बल (ES), वोल्टता (VS) के बराबर होगी।
∴ समी(3) से, V_S/(V_P )=N_S/N_P = r ,समी(4) जहां r को परिणमन अनुपात कहते हैं।माना प्राथमिक कुंडली में प्रवाहित धारा iP व द्वितीय कुंडली में प्रवाहित धारा iS हो। यदि किसी क्षण शक्ति का ह्रास बिल्कुल ना हो तो आदर्श स्थिति में —
प्राथमिक कुंडली मे निवेशी शक्ति = द्वितीयक कुंडली मे निर्गत शक्ति , V_p×i_p= V_s× i_S i_p/i_s =V_s/V_p या V_s/V_p =i_p/i_s ,समी(5) समी(4) व (5) से, व तब धारा अधिक होगी अर्थात अपचायी ट्रांसफार्मर होगा। V_s/V_p =N_S/N_P =i_p/i_s =r ,समी(6) ⇒ V_sट्रांसफार्मर में नर्म लोहे की आयताकार या वृताकार पत्तियां पटलित क्रोड के रूप में होती हैं। ये पत्तियां वार्निश के द्वारा जुड़ी होती हैं ताकि भंवर धाराएं कम उत्पन्न हो। इनमें दो कुंडलिया होती हैं। एक कुंडली में फेरों की संख्या कम तथा दूसरी कुंडली में फेरों की संख्या अधिक होती है।
अपचाई ट्रांसफार्मर में प्राथमिक कुंडली में पतले तांबे के तार के अधिक (ज्यादा) फेरे होते हैं, जबकि द्वितीयक कुंडली में तांबे के मोटे तार के कम फेरे होते हैं।
उच्चाई ट्रांसफार्मर में प्राथमिक कुंडली में तांबे के मोटे तार के कम फेरे होते हैं, जबकि द्वितीयक कुंडली में तांबे के पतले तार के अधिक (ज्यादा) फेरे होते हैं।
ट्रांसफार्मर में ऊर्जा की हानियां (Energy Losses in Transformers) :-
ट्रांसफार्मर में निम्न लिखित हानियां होती हैं —(1) तांबे में हानि (ताम्रक्षय) (Copper Loss)
ट्रांसफार्मर की कुंडलियां तांबे की बनी होती हैं। जब प्राथमिक व द्वितीयक कुंडली में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होती है, तो कुछ विद्युत ऊर्जा तांबे के फेरों में ऊष्मा के रूप में क्षय हो जाती है। जिसे ताम्रक्षय कहते हैं। कुंडलियों में उत्पन ऊष्मा को अवशोषित करने के लिए कुंडलियों के चारों ओर तेल अथवा ठंडी हवा प्रवाहित की जाती है।
(2) भंवर धाराओं में हानि (Losses in Eddy Clurrents)
ट्रांसफार्मर में लोहे की क्रोड में भंवर धाराएं स्थापित होने से भी कुछ ऊर्जा, ऊष्मा के रुप में क्षय हो जाती है। इस प्रकार की हानि को ट्रांसफार्मर की क्रोड को पटलित करके कम किया जाता है।
(3) शैथिल्य हानि (Hysteresis Loss)
प्रत्यावर्ती धारा के प्रत्येक चक्र में लोहे की क्रोड चुम्बकित तथा बिचुम्बकित होती है। इस प्रक्रिया में भी ऊर्जा, ऊष्मा के रुप में क्षय होती है।
(4) फ्लक्स हानि (Flux Loss)
प्राथमिक व द्वितीयक कुंडली में युग्म न कभी भी पूर्ण नहीं होता है। अतः प्राथमिक कुंडली में जनित चुम्बकीय फ्लक्स द्वितीयक कुंडली से नहीं गुजरता है।
L-C-R परिपथ के लिए प्रतिबद्ध तथा कलांतर के लिए व्यंजक (Expressions for Commitment and Phase Difference for L-C-R Circuit) :-
माना एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में L प्रेरकत्व की कुंडली, C धारिता का संधारित्र एवं R प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। किसी क्षण प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवान्तर VR तथा धारा i से समान कला में होंगे। प्रेरकत्व L में प्रेरित विभावांतर VL धारा i से कला में 900 अग्रगामी होगा, परंतु संधारित्र C में प्रेरित विभावांतर VC धारा i से कला में 900 पश्चगामी होगा। VL व VC परस्पर विपरीत दिशाओं में होंगे। अतः VL तथा VC का परिणामी विभवान्तर (VL - VC) होगा। यदि परिपथ का परिणामी विभवान्तर V हो तो —
V=(V_R )^2+(V_L-V_L )^2 समी(1) यदि परिपथ में धारा i हो तो ओम के नियम से — V= iR V_R= iR V_L= iX_L V_C= iX_C इन मानों को समी(1) में रखने पर — V^2=(iR)^2+(iX_L- iX_C )^2 समी(1) V^2= i^2 R^2+ i^2 (X_L- X_C )^2 V^2= i^(2 ) [R^2+ (X_L- X_C )^2 ] V= i√(R^2+(X_L- X_C ) ) V/i= √(R^2+(X_L- X_C ) )परंतु V/i परिपथ द्वारा प्रत्यावर्ती धारा i के मार्ग में उत्पन्न अवरोध है, जिसे प्रत्यावर्ती परिपथ की प्रतिबाधा Z कहते हैं।
Z= √(R^2+(X_L- X_C ) ) Z=√( R^2+( ωL-1/ωC)^2 ) ,{ X_L=ωL,X_C=1/ωC } यदि वोल्टता V तथा धारा i के बीच कलांतर ϕ हो तो — tanϕ=लम्ब/आधार=(V_L- V_C)/R=(iX_L- iX_C)/iR tanϕ=i(X_L- X_C )/iR =(X_L- X_C)/R ϕ= tan^(-1) ((X_L- X_C)/R ) ϕ= tan^(-1) ((ωL-1/ωC)/R ) स्पष्ट है कि कलांतर ϕ का मान, R तथा XL व XC के आपेक्षिक मान पर निर्भर करता है। विशेष स्थितियांइसकी निम्न तीन स्थितियां हैं (i) यदि X_C>X_L अर्थात ωL<1 i="" ii="" tan="" x_c="">1/ωC है, तो tanϕ अर्थात ϕ धनात्मक होगा। इस दशा में धारा i वोल्टेज (V) से पश्चगामी होगी। (iii) यदि X_C=X_L अर्थात ωL=1/ωC है, तो tanϕ=0 अर्थात ϕ=0^0 होगा। इस दशा में धारा i वोल्टेज (V) समान कला में होंगे इस स्थिति में प्रतिबाधा Z=√( R^2+(0)^2 )= R . अर्थात इस स्थिति में प्रतिबाधा न्यूनतम तथा प्रतिरोध (R) के बराबर होगी तथा धारा i अधिकतम होगी। यह स्थिति विद्युत अनुनाद कहलाती है।
Physics Class 12th Complete Theory Notes in Hindi (Kumar Mittal Book) : पढ़ने के लिए chapter के ठीक ऊपर click या touch करें।
Physics Chapter 1 Theory Physics Chapter 2 Theory Physics Chapter 3 Theory Physics Chapter 4 Theory Physics Chapter 5 Theory Physics Chapter 6 Theory Physics Chapter 7 Theory Physics Chapter 8 Theory Physics Chapter 9 Theory Physics Chapter 10 Theory Physics Chapter 11 Theory Physics Chapter 12 Theory Physics Chapter 13 Theory Physics Chapter 14 Theory Physics Chapter 15 Theory Physics Chapter 16 Theory Physics Chapter 17 Theory Physics Chapter 18 Theory Physics Chapter 19 Theory Physics Chapter 20 Theory Physics Chapter 21 Theory Physics Chapter 22 Theory Physics Chapter 23 Theory Physics Chapter 24 Theory Physics Chapter 25 Theory Physics Chapter 26 Theory Physics Chapter 27 Theory Physics Chapter 28 Theory
11. Alternating Current: Complete Notes.
1>
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें