अध्याय 4 संधारित्र तथा परावैद्धुत भौतिक विज्ञान कक्षा 12 || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 4 Capacitor and Dielectric Notes in Hindi

अध्याय 4 संधारित्र तथा परावैद्धुत भौतिक विज्ञान कक्षा 12 || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 4 Capacitor and Dielectric Notes in Hindi


Unit – 1 स्थिर विद्युतिकी

अध्याय – 4 संधारित्र तथा परावैद्धुत (Capacitor and Dielectric)


अध्याय 4 संधारित्र तथा परावैद्धुत | आप इस आर्टिकल (लेख) में क्या सीखेंगे?

  1. चालक तथा विद्युतरोधी अथवा परावैद्युत (चालक, विद्युतरोधी, अर्द्धचालक)
  2. चालकों में मुक्त तथा बद्ध आवेश (मुक्त इलेक्ट्रॉन, बद्ध इलेक्ट्रॉन)
  3. विद्युत धारिता की अभिधारणा तथा इसकी परिभाषा (फैरड की परिभाषा)
  4. विद्युत धारिता का मात्रक एवं विमा
  5. विलगित गोलीय चालक की धारिता, आवेशित चालक की विद्युत स्थितिज ऊर्जा
  6. दो आवेशित चालकों को एक दूसरे से जोड़ने पर आवेशों का पुनर्वितरण उभयनिष्ठ विभव तथा ऊर्जा का ह्रास
  7. चालक की धारिता की निर्भरता
  8. संधारित्र (संरचना एवं सिद्धान्त), संधारित्र की धारिता
  9. संधारित्र की धारिता को प्रभावित करने वाले कारक 
  10. समान्तर प्लेट संधारित्र
  11. समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता (परावैद्युतांक की परिभाषा)
  12. संधारित्र में परावैद्युत का कार्य : आवेश का संग्रहण, 
  13. परावैद्युत का ध्रुवण
  14. परावैद्युत सामर्थ्य तथा भंजक विभवान्तर
  15. संधारित्र के परावैद्युत पर प्रेरित आवेश
  16. संधारित्र की धारिता पर परावैद्युत का प्रभाव
  17. समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता जब उसकी प्लेटों के बीच आंशिक रूप से परावैद्युत पदार्थ रखा हो
  18. आवेशित संधारित्र की स्थितिज ऊर्जा
  19. आवेशित समान्तर प्लेट संधारित्र की प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र में ऊर्जा घनत्व
  20. आवेशित समान्तर प्लेट संधारित्र की प्लेटों के बीच बल
  21. परावैद्युत का विभिन्न राशियों पर प्रभाव
  22. संधारित्रों के संयोजन (श्रेणीक्रम, समांतर क्रम)
  23. संधारित्रों के उपयोग

चालक तथा विद्धुतरोधी अथवा परावैद्युत (Conductors and Insulators or Dielectrics)

विद्युत व्यवहार के आधार पर पदार्थ मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं —

  1. चालक (Conductors)
  2. कुचालक अथवा विद्युतरोधी (Insulators)

चालक (Conductors)

वे पदार्थ जिनमें बाह्य विद्युत क्षेत्र लगाने पर बहुत अधिक आवेश वाहक गतिमान हो जाते हैं, चालक कहलाते हैं। अथवा वे पदार्थ जिनमें धारा का प्रवाह सरलता से होता है, चालक अथवा सुचालक कहलाते हैं।
जैसे— लोहा, तांबा, एल्युमिनियम, चांदी, पारा आदि।

विद्धुतरोधी अथवा परावैद्युत (Insulators or Dielectrics)

वे पदार्थ जो अपने में से विद्युत आवेश को प्रवाहित नहीं होने देते हैं, परावैद्युत कहलाते हैं।

अथवा वे पदार्थ जिनमें बाह्य विद्युत क्षेत्र लगाने पर आवेश वाहक गतिमान नहीं होते हैं, कुचालक कहलाते हैं।

अथवा वे पदार्थ जिनमें धारा का प्रवाह संभव नहीं होता है, विद्युतरोधी अथवा परावैद्युत अथवा कुचालक कहलाते हैं।
जैसे— कांच, रबण, अभ्रक, लकड़ी, कागज, शुष्क वायु आदि।

अर्द्धचालक (Semi Conductors)

वे पदार्थ जिनकी चालकता चालकों से कम तथा विद्युतरोधी (कुचालकों) से ज्यादा/अधिक होती है अर्द्धचालक कहलाते हैं।
जैसे — जर्मेनियम, सिलिकॉन।

Note :- प्रकृति में शुद्ध रूप से पाए जाने वाले दो अर्धचालक जर्मेनियम, सिलिकॉन हैं।


चालकों में मुक्त तथा बद्ध आवेश (Free and Bound Charges inside a Conductor)

प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनता है और ये छोटे-छोटे कण अतिसूक्ष्म परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक परमाणु में इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन होते हैं। प्रोटॉन इसके अतिसूक्ष्म भाग नाभिक में होते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारो ओर की कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते हैं। इलेक्ट्रॉन ऋण आवेशित तथा प्रोटॉन धन आवेशित होते हैं। परमाणुओं में ऋणावेश तथा धनावेश समान मात्रा में होता है। अतः सामान्य अवस्था में परमाणु विद्युत का उदासीन होता है।

नाभिक के चारों ओर की कक्षाओं में से निकटवर्ती कक्षाओं के इलेक्ट्रॉन नाभिक से प्रबल आकर्षण बल द्वारा बंधे रहते हैं तथा दूर की कक्षाओं के इलेक्ट्रॉनों पर आकर्षण बल क्रमशः क्षीण होता जाता है। सबसे बाहरी कक्षा के इलेक्ट्रॉन नाभिक से क्षीणतः बद्ध होते हैं, इन इलेक्ट्रॉनों को संयोजी इलेक्ट्रॉन कहते हैं। कमरे के ताप पर ये इलेक्ट्रॉन लगभग मुक्त होते है और पदार्थ में मुक्त रूप से गति करते रहते हैं। अतः इन्हीं इलेक्ट्रॉनों को मुक्त इलेक्ट्रॉन कहते हैं। चूंकि इन इलेक्ट्रॉनों पर $1.6×10^{-19}$ कूलॉम आवेश होता है। अतः इन्हें मुक्त आवेश कहते हैं।

किसी परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकल जाने पर परमाणु धनावेशित हो जाता है और यह आयन कहलाता है। ये धन आवेशित आयन धातु जालक में स्थाई रूप से बद्ध होते हैं तथा अपनी स्थिति छोड़कर नहीं जा सकते हैं। इन पर $1.6×10^{-19}$ कूलॉम आवेश होता है। इन धन आयनों को बद्ध आवेश कहते हैं।

Note :- अचालक पदार्थ में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं अतः इनमें मुक्त आवेश भी नहीं होते हैं।

[स्कूल क्लास नोट्स -
प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से मिलकर बनता है। परमाणु के बीच में एक भारी भाग होता है जिसे नाभिक कहते हैं। नाभिक के चारों ओर वृत्तीय कक्षाएं होती हैं। जिनमें इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते रहते हैं। नाभिक के निकटवर्ती कक्षाओं के इलेक्ट्रॉन प्रबल आकर्षण बल से बंधे होते हैं। जबकि दूर के इलेक्ट्रॉन दुर्बल/क्षीण बल से बंधे होते हैं। इन इलेक्ट्रॉनों को संयोजी इलेक्ट्रॉन कहते हैं। क्योंकि इन पर $-1.6×10^{-19}$ C आवेश होता है। अतः इन्हें मुक्त आवेश कहते हैं। किसी परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकल जाने पर वह धन आवेशित हो जाता है और अपनी स्थिति को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता है, क्योंकि वह धातु जालक से बंधा होता है। इनको बद्ध आवेश कहते हैं।]


वैद्युत धारिता (Electric Capacitance)

“किसी चालक की विद्युत आवेश संग्रहण करने की क्षमता को उसकी धारिता कहते हैं। इसे C से प्रदर्शित करते हैं।” अतः “किसी चालक की विद्युत आवेश संग्रहण करने की क्षमता की माप को उसकी धारिता कहते हैं।” जब किसी चालक को आवेश दिया जाता है तो उसका विभव आवेश के अनुपात में बढ़ता है।

अतः यदि किसी चालक को q आवेश देने पर उसके विभव में V वृद्धि हो तो –

$q∝V$
$q=CV$
यहां $C$ एक नियतांक है जिसे चालक की विद्युत धारिता कहते हैं।
$C=q/V$

अतः “किसी चालक को दिए गए आवेश तथा चालक के विभव में होने वाली वृद्धि के अनुपात को चालक की विद्युत धारिता कहते हैं।”

धारिता का मात्रक (Unit of Capacitance)

विद्युत धारिता C का SI मात्रक कूलॉम/वोल्ट होता है। इसे फैरड कहते हैं। फैरड को F से प्रदर्शित करते हैं।

∵ $C=q/V$
C का मात्रक=(q का मात्रक)/(V का मात्रक)
=कूलॉम⁄वोल्ट
=फैरड
1 फैरड=1 कूलॉम/वोल्ट

अतः “किसी चालक को 1 कूलॉम आवेश देने पर यदि उसके विभव में 1 वोल्ट की वृद्धि हो तो उस चालक की धारिता 1 फैरड होती है।”

इसके व्यावहारिक मात्रक माइक्रोफैरड तथा पिकोफैरड होते हैं।
1 माइक्रोफैरड (μF)=10^(-6) F
1 पिकोफैरड (pF)=10^(-12) F= 10^(-12) μμF

विद्युत धारिता की विमा (Dimension of Electric Capacitance)

∵ C=q/V
C का मात्रक=(q का मात्रक)/(V का मात्रक)
=कूलॉम/वोल्ट
=कूलॉम/(जूल⁄कूलॉम)
=(कूलॉम^2)/जूल
अतः धारिता की विमा=[AT]^2/[ML^(2T^(-2) ) ] =[M^(-1) L^(-2) T^4 A^2]

विलगित गोलीय चालक की धारिता (Capacity of an Isolated Spherical Conductor)

माना R त्रिज्या का एक विलगित गोलीय चालक निर्वात में रखा है। माना इस गोलीय चालक को +q आवेश दिया जाता है जो चालक के बाहरी पृष्ठ पर एकसमान रूप से वितरित हो जाता है। अतः चालक के पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर समान विभव होगा और प्रत्येक बिन्दु पर बल रेखाएं लम्बवत त्रिज्या के अनुदिश आती हुईं प्रतीत होंगी। अतः गोलीय चालक के किसी बिन्दु पर विद्युत विभव ज्ञात करने के लिए हम चालक को केंद्र O पर रखा हुआ मान सकते हैं।

अतः गोलीय चालक के पृष्ठ पर विद्युत विभव—
V=1/(4πϵ_0 ) q/R,eq(1)
जबकि धारिता C=q/V
∴ C=q/((1/(4πϵ_0 ) q/R) )
C=4πϵ_0 R फैरड eq(2)
यदि विलगित गोलीय चालक K परावैद्युतांक वाले माध्यम में रखा हो तो विलगित गोलीय चालक की धारिता —
C_K=4πϵ_0 KR फैरड eq(3)
C_K∝K
अतः किसी परावैद्युत माध्यम में स्थित विलगित गोलीय चालक की धारिता चालक की त्रिज्या के अनुक्रमानुपाती होती है।
समी (2) और (3) से —
C_K/C=(4πϵ_0 KR)/(4πϵ_0 R)
C_K/C=K
अतः किसी माध्यम में गोलीय चालक की धारिता तथा निर्वात या वायु में उसी चालक की धारिता का अनुपात, उस माध्यम के परावैद्युतांक के बराबर होता है।

[स्कूल क्लास नोट्स -
माना r त्रिज्या का विलगित गोलीय चालक निर्वात में रखा है। इसको +q कूलॉम आवेश दिया जाता है जो इसके पृष्ठ पर एकसमान रूप से फैल जाता है। अतः पृष्ठ के किसी भी बिंदु पर विभव समान होगा तथा प्रत्येक बिंदु से निकलने वाली विद्युत बल रेखाएं गोलीय चालक के पृष्ठ के लंबवत बाहर की ओर होंगी। अतः हम गोलीय आवेश +q को केंद्र O पर रखा हुआ मान सकते हैं।

तब गोलीय चालक के पृष्ठ पर विभव –
V=1/(4πϵ_0 ) q/r ,eq(1)
जबकि चालक की धारिता –
C=q/V ,eq(2)
समी (1) और (2) से –
C=q/V
C=q/((1/(4πϵ_0 ) q/r) )=(4πϵ_0 qr)/q
C=4πϵ_0 r ,eq(3)
यदि गोलीय चालक परावैद्युतांक वाले माध्यम में रखा हो तो विलगित गोलीय चालक की धारिता —
C_K=4πϵ_0 Kr ,eq(4)
समीकरण (3) से (4) को भाग देने पर –
C_K/C=(4πϵ_0 Kr)/(4πϵ_0 r)=K
C_K/C=K
]

आवेशित चालक की विद्युत स्थितिज ऊर्जा (Electric Potential Energy of an Charged Conductor)

“किसी चालक को आवेशित करने में किए गए सम्पूर्ण कार्य को उस चालक की विद्युत स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।” इसे U से प्रदर्शित करते हैं। इसका मात्रक जूल होता है।

माना किसी अनावेशित चालक को +q आवेश बहुत छोटे-छोटे भागों में दिया जाता है तो प्रारम्भ में विभव शून्य (0) होता है। अतः चालक को आवेश का प्रारंभिक/पहला भाग देने में कोई कार्य नहीं करना पड़ता। परंतु इसके बाद चालक को छोटे-छोटे भागों में आवेश देते हैं तो बाह्य कर्ता को चालक पर पहले से उपस्थित आवेश के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है। माना अंतिम भाग देने पर विभव V हो जाता है।

चालक का औसत विभव =(0+V)/2=V/2
अतः चालक को आवेश देने में किया गया कार्य —
W=आवेश×विभव
=q×V/2
W=1/2 qV
यही कार्य चालक पर “विद्युत स्थितिज ऊर्जा” के रूप में संचित हो जाता है।
U=W
U=1/2 qV ,eq(1)
∵V=q⁄C
∴ U=1/2 q (q/C)
U=1/2 q^2/V ,eq(2)
∵V=q⁄C⇒ q=CV
∴U=1/2 (CV)V
U=1/2 CV^2,eq(3)
Therefore,U=1/2 qV=1/2 q^2/V=1/2 CV^2

दो आवेशित चालकों को एक दूसरे से जोड़ने पर उभयनिष्ट विभव, आवेशों का पुनर्वितरण तथा ऊर्जा ह्रास (Redistribution of Charges, Common Potential and Loss of Energy on Conducting Two Charged Conductos)

माना दो चालक A और B हैं। जिनकी धारिताएं क्रमशः C_1 व C_2 हैं। इनको q_1 व q_2 आवेश देने पर विभव V_1 व V_2 हो जाते हैं। यदि चालक A को किसी पहले तार द्वारा चालक B से जोड़ दें तो आवेश उच्च विभव से निम्न विभव की ओर जाने लगता है। यह आवेश तब तक जाता रहता है जब तक की दोनों चालकों का विभव समान न हो जाए अर्थात चालकों में आवेशों का पुनर्वितरण हो जाता है। माना पुनर्वितरण के बाद चालकों का उभयनिष्ठ विभव V है।

∵ C=q/V⇒q=CV
∴ q_1=C_1 V_1
q_2=C_2 V_2
अब यदि दोनों चालकों को एक पतले तार से कुछ समय के लिए जोड़ दें तो आवेश (धन) उच्च विभव से निम्न विभव की जाने लगता है।
अब चालक का कुल आवेश =q_1+q_2
तथा चालक की कुल धारिता =C_1+C_2
अतः चालक का उभयनिष्ट विभव =(कुल आवेश)/(कुल धारिता)
V=(q_1+q_2)/(C_1+C_2 )
V=(C_1 V_1+C_2 V_2 )/(C_1+C_2 ),eq(1)
माना आवेशों के पुनर्वितरण के बाद चालक A पर q_1^' आवेश तथा चालक B पर q_2^' आवेश हो जाता है। तब —
q_1^'=C_1 V
q_2^'=C_2 V
∴(q_1^')/(q_2^' )=(C_1 V)/(C_2 V)
∴(q_1^')/(q_2^' )=C_1/C_2 ,eq(2)
अतः दो आवेशित चालकों को जोड़ने पर पुनर्वितरित आवेशों का अनुपात उनकी धारिताओं के अनुपात के बराबर होता है।

आवेशों का पुनर्वितरण (Redistribution of Charges)

चूंकि दोनों चालकों को जोड़ने से पहले, चालक A पर q_1 आवेश था और माना इनको जोड़ने के बाद अब चालक A पर q_1^' आवेश बच जाता है।
चालक A से, चालक B पर स्थानांतरित आवेश की मात्रा —

q_1-q_1^'= C_1 V_2-C_1 V
= C_1 (V_1-V)
= C_1 (V_1-(C_1 V_1+C_2 V_2 )/(C_1+C_2 )),from eq(1)
= C_1 ((C_1 V_1+C_2 V_1-C_1 V_1-C_2 V_2 )/(C_1+C_2 ))
= C_1 ((C_2 V_1-C_2 V_2 )/(C_1+C_2 ))
= C_1 C_2 ((V_1-V_2)/(C_1+C_2 ))
∴q_1-q_1^'=(C_1 C_2 (V_1-V_2 ))/(C_1+C_2 ),eq(3)

ऊर्जा का ह्रास (Loss of Energy s)

पुनर्वितरण से पहले, चालक A की स्थितिज ऊर्जा —
U_A=1/2 C_1 V_1^2
पुनर्वितरण से पहले, चालक B की स्थितिज ऊर्जा —
U_B=1/2 C_2 V_2^2
पुनर्वितरण से पहले, चालकों की कुल स्थितिज ऊर्जा —
U=U_A+U_B
U=1/2 C_1 V_1^2+1/2 C_2 V_2^2
U=1/2 (C_1 V_1^2+C_2 V_2^2 ),eq(4)
पुनर्वितरण के बाद, चालक A की स्थितिज ऊर्जा —
U_A'=1/2 C_1 V^2
पुनर्वितरण के बाद, चालक B की स्थितिज ऊर्जा —
U_B^'=1/2 C_2 V^2
पुनर्वितरण के बाद, चालकों की कुल स्थितिज ऊर्जा —
U^'=U_A^'+U_B^'
U^'=1/2 C_1 V^2+1/2 C_2 V^2
U^'=1/2 (C_1+C_2 ) V^2
समीकरण (1) से V का मान रखने पर —
U^'=1/2 (C_1+C_2 ) [(C_1 V_1+C_2 V_2 )/(C_1+C_2 )]^2
U^'=1/2 (C_1+C_2 )[(C_1 V_1+C_2 V_2 )^2/(C_1+C_2 )^2 ]
U^'=1/2 (C_1 V_1+C_2 V_2 )^2/(C_1+C_2 ),eq(5)
अतः पुनर्वितरण के बाद ऊर्जा का ह्रास —
∆U=U-U^'
∆U= 1/2 (C_1 V_1^2+C_2 V_2^2 )-1/2 (C_1 V_1+C_2 V_2 )^2/(C_1+C_2 )
∆U=1/2(C_1+C_2 ) [(C_1 V_1^2+C_2 V_2^2 )(C_1+C_2 )-(C_1 V_1+C_2 V_2 )^2 ]
∆U=1/2(C_1+C_2 ) [C_1^2 V_1^2+C_1 C_2 V_2^2+C_1 C_2 V_1^2+C_2^2 V_2^2-(C_1^2 V_1^2+C_2^2 V_2^2+2C_1 C_2 V_1 V_2 )]
∆U=1/2(C_1+C_2 ) [C_1^2 V_1^2+C_1 C_2 V_2^2+C_1 C_2 V_1^2+C_2^2 V_2^2-C_1^2 V_1^2-C_2^2 V_’^2-2C_1 C_2 V_1 V_2 ]
∆U=1/2(C_1+C_2 ) [C_1 C_2 V_2^2+C_1 C_2 V_1^2±C_2^2 V_2^2-2C_1 C_2 V_1 V_2 ]
∆U=(1×C_1 C_2)/2(C_1+C_2 ) [V_2^2+V_1^2-2V_1 V_2 ] ∆U=(C_1 C_2)/2(C_1+C_2 ) (V_1-V_2 )^2

चालक की धारिता की निर्भरता (Dependence of Capacity of a Conductor)

किसी चालक की धारिता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है।
1. चालक की धारिता चालक के आकर पर निर्भर करती है। विद्युत धारिता चालक के आकर के अनुक्रमानुपाती होती है।
C∝a ,eq(1)
2. चालक की धारिता माध्यम के परावैद्युतांक पर निर्भर करती है। विद्युत धारिता चालक के परावैद्युतांक के अनुक्रमानुपाती होती है।
C∝K ,eq(2)
3. अन्य चालकों की उपस्थिति से चालक की धारिता बढ़ जाती है।

संधारित्र (Capacitor)

“संधारित्र एक ऐसा समायोजन या युक्ति होती है जिसमें किसी चालक के आकार में परिवर्तन किए बिना उसका विभव कम करके आवेश की पर्याप्त मात्रा संचित कर सकते हैं। ऐसे समायोजन को संधारित्र कहते हैं।”

अथवा “संधारित्र एक ऐसा समायोजन होता है जो चालक के आकार में परिवर्तन किए बिना उसे पर पर्याप्त मात्रा में आवेश संचित करता है।”

अतः दो चालकों को समीप लाने से बना समायोजन जो एक छोटे से क्षेत्र में विद्युत आवेश की पर्याप्त मात्रा संचित करने के लिए उपयोग किया जाता है, संधारित्र कहलाता है।

माना किसी चालक को +q आवेश देने पर उसका विभव V हो जाता है तब –
C=q/V or C∝1/V
अतः किसी चालक का विभव V कम होने पर उसकी धारिता C बढ़ जाती है। यही संधारित्र का सिद्धान्त है।

संधारित्र का सिद्धांत (Principle of Capacitor)

संधारित्र इस सिद्धांत पर आधारित है की जब किसी आवेशित चालक के समीप एक अन्य अनावेशित चालक रख दिया जाए तो आवेशित चालक का विभव काम हो जाता है। यदि आवेशित चालक को पृथ्वी से जोड़ दें तो विभव और भी कम हो जाता है इसके फलस्वरुप आवेशित चालक की धारिता में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है। यदि चालक का विभव घटेगा तो संधारित्र की धारिता बढ़ेगी यदि चालक का विभव बढ़ेगा तो संधारित्र की धारिता घटेगी

जब किसी आवेशित चालक के समीप एक अन्य अनावेशित चालक रख दिया जाता है तो अन्वेषी चालक का विभव काम हो जाता है यदि अनावेशित चालक को पृथ्वी से जोड़ दिया जाए तो विभव और भी कम हो जाता है।


संधारित्र की संरचना एवं कार्यविधि (Structure and Working of Capacitor)

इसमें धातु की दो प्लेटें P_1 व P_2 होती हैं जो विद्युतरोधी स्टैंड पर लगी होती हैं। जब P_1 प्लेट को +q आवेश दिया जाता है तो P_2 प्लेट पर प्रेरण द्वारा इतना ही ऋण आवेश (-q) तथा प्लेट के पीछे वाले तल पर धन आवेश (+q) उत्पन्न हो जाता है। P_2 प्लेट का ऋण आवेश P_1 प्लेट के विभव को कम करने का प्रयास करता है। हालांकि प्लेट P_2 पर धन तथा ऋण आवेशों की समान मात्रा होती है, परंतु प्लेट P_1 का ऋण आवेशित तल अधिक निकट होने के कारण धनावेश की अपेक्षा अधिक प्रभाव डालता है। अतः P_1 प्लेट का विभव थोड़ा कम हो जाता है। प्लेट P_1 को पुनः उतने ही विभव तक लाने के लिए इसे और आवेश देना होगा। इस प्रकार प्लेट P_2 की उपस्थिति के कारण प्लेट P_1 की विद्युत धारिता बढ़ जाती है।

यदि P_2 प्लेट को पृथ्वी से जोड़ दें तो विभव और भी कम हो जाता है। अतः P_1 प्लेट को पुन उसी विभव तक लाने के लिए इसे और अधिक आवेश दिया जा सकता है। अतः इसकी धारिता और बढ़ जाती है। अतः स्पष्ट है कि किसी आवेशित चालक के समीप दूसरा चालक लाकर उसकी धारिता को बढ़ाया जा सकता है।


संधारित्र की धारिता (Capacitance of a Capacitor)

यदि किसी संधारित्र की प्लेटों पर आवेश q तथा हो तथा उनके बीच विभावांतर V हो तो संधारित्र की धारिता –

C=q/V
किसी संधारित्र की विद्युत आवेश संग्रहण करने की क्षमता को संधारित्र की धारिता कहते हैं।
यदि किसी संधारित्र की धनावेशित प्लेट P_1 का विभव 〖+V〗_1 तथा ऋण आवेशित प्लेट P_2 का विभव 〖-V〗_2 हो तो प्लेट P_1 का परिणामी विभव —
V_A=V_1+(-V_2 )=V_1-V_2
चूंकि संधारित्र की दूसरी प्लेट पृथ्वी से जुड़ी है। अतः प्लेट P_2 का विभव —
V_B=0
अतः दोनों प्लेटों के बीच विभवांतर —
V=V_A-V_B=(V_1-V_2 )-0
V=V_1-V_2
अतः संधारित्र की धारिता —
C=q/V=q/(V_1-V_2 )

अतः किसी संधारित्र की धारिता उसकी एक प्लेट को दिए गए आवेश तथा दोनों प्लेटों के बीच उत्पन्न विभवांतर के अनुपात के बराबर होती है।

अतः स्पष्ट है कि किसी संधारित्र की एक प्लेट को दिए गए आवेश तथा दोनों प्लेटों के बीच उत्पन्न विभवांतर के अनुपात को संधारित्र की धारिता कहते हैं।


समांतर प्लेट संधारित्र (Parallel Plate Capacitor)

समांतर प्लेट संधारित्र एक ऐसा समायोजन है जिसमें धातु की दो लम्बी व समतल प्लेटें होती हैं। जो कुछ दूरी पर दो विद्युतरोधी स्टैंडों में लगी होती हैं। जब एक प्लेट को आए धनावेशित किया जाता है और दूसरी प्लेट पर प्रेरण के द्वारा समान मात्रा में ऋण आवेश उत्पन्न हो जाता है। यह साधन ही समांतर प्लेट संधारित्र कहलाता है। इसमें एक प्लेट को विद्युत स्रोत से तथा दूसरी प्लेट को पृथ्वी से संबंधित कर देते हैं। यदि प्लेटों के बीच वायु भरी हो तो इसे वायु समांतर प्लेट संधारित्र कहते हैं।

माना दो प्लेटें P_1 व P_2 हैं। जो कुछ दूरी पर दो विद्युतरोधी स्टैंडों में लगी हैं। जब P_1 प्लेट को धनावेशित किया जाता है तो दूसरी प्लेट P_2 पर प्रेरण के द्वारा समान मात्रा में ऋण आवेश उत्पन्न हो जाता है। चूंकि प्लेट P_2 का बाहरी तल पृथ्वी से संबंधित है। अतः बाहरी तल निरावेशित हो जाता है।

माना प्रत्येक प्लेट का पृष्ठ आवेश घनत्व σ हो तो समांतर प्लेटों के बीच किसी बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता —

E=σ/ϵ_0
यदि माध्यम का परावैद्युतांक K हो तो —
E=σ/(Kϵ_0 ),eq(1)
∵ पृष्ठ आवेश घनत्व
σ=q/A⇒q=σA
समी (1) में σ का मान रखने पर —
E=(q⁄A)/(Kϵ_0 )
E=q/(Kϵ_0 A)
∵ हम जानते हैं कि —
E=V/d
⇒V=Ed
समी (1) में E का मान रखने पर —
V=qd/(Kϵ_0 A)
अतः समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता — C=q/V=q/(qd⁄(Kϵ_0 A))
C=(Kϵ_0 A×d)/qd
C=(Kϵ_0 A)/d ,eq(2)
यदि K=1 हो तो —
C_0=(ϵ_0 A)/d ,eq(3)
समी (3) में समी (2) का भाग देने पर –
C/C_0 =((Kϵ_0 A)/d)/((ϵ_0 A)/d)
C/C_0 =K⇒C=KC_0

अतः स्पष्ट है कि प्लेटों के बीच निर्वात के स्थान पर परावैद्युत माध्यम होने पर संधारित्र की धारिता K गुनी बढ़ जाती है।


समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता जब उसकी प्लेटों के बीच आंशिक रूप से परावैद्युत पदार्थ रखा हो (Capacity of Parallel Plate Capacitor Partly Filled with Dielectric Substance)

माना समांतर प्लेट संधारित्र की दो प्लेटें P_1 व P_2 हैं जिनके बीच की दूरी d है तथा जो वायु में कुछ दूरी पर दो विद्युतरोधी स्टैंडों में लगी हैं। माना प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल A है। प्लेटों के बीच एक परावैद्युत पदार्थ रखा K रखा है जिसकी मोटाई t है।
अतः प्लेटों के बीच वायु विद्युत क्षेत्र की तीव्रता —

E_0=q/(ϵ_0 A) ,eq(1) तथा परावैद्युत पदार्थ में विद्युत क्षेत्र की तीव्रता — E_K=q/(Kϵ_0 A) ,eq(2) यदि प्लेटों के बीच विभावांतर V हो तो — V=V_0+V_K ,eq(3) ∵ E=V/d⇒ V=Ed ∴ V=E_0 (d-t)+Et V=q/(ϵ_0 A) (d-t)+q/(Kϵ_0 A) t V=q/(ϵ_0 A) [(d-t)+t/K] V/q=1/(ϵ_0 A) [(K(d-t)+t)/K] 1/C=1/(ϵ_0 A) [(K(d-t)+t)/K] ,∵C=q/V⇒1/C=V/q C=ϵ_0 A[K/(K(d-t)+t)] C=(Kϵ_0 A)/(K(d-t)+t) ,eq(4) इस समीकरण के दाएं (LHS) पक्ष में K का गुणा व भाग करने पर — C=(ϵ_0 A)/((d-t)+t/K) ,eq(5) समी 4 से C∝K तथा K का मान सदैव 1 से अधिक होता है।

अतः समांतर प्लेट संधारित्र की प्लेटों के बीच परावैद्युत पदार्थ (माध्यम) होने पर संधारित्र की धारिता K गुनी बढ़ जाती है।


समांतर प्लेट संधारित्र में परावैद्युत का कार्य : आवेश संग्रहण (Function of Dielectric in a Capacitor : Accumulation of Charge)

प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से मिलकर बनता है। परमाणु का नाभिक धन आवेशित तथा इलेक्ट्रॉन ऋण आवेशित होते हैं। जबकि हम जानते हैं कि संधारित्र में दो प्लेटें क्रमशः धन आवेशित तथा ऋण आवेशित होती हैं। माना प्लेटों के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र E है। यदि इन प्लेटों के बीच कोई परावैद्युत पदार्थ रख दिया जाए तो उसके परमाणु का धन आवेश, ऋण आवेशित प्लेट की ओर तथा परमाणु का ऋण आवेश प्लेट के धन आवेश की ओर विस्थापित हो जाता है अर्थात परावैद्युत पदार्थ का ध्रुवण हो जाता है। अतः परावैद्युत पदार्थ के प्रत्येक परमाणु का एक सिरा धनावेशित प्लेट की ओर तथा दूसरा सिरा ऋण आवेशित की ओर हो जाता है। फलस्वरुप परावैद्युत पदार्थ का धन प्लेट के समीप वाला सिरा ऋणावेशित तथा ऋण प्लेट के समीप वाला सिरा धनावेशित हो जाता है। जिससे परावैद्युत पदार्थ के भीतर विपरीत दिशा में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न E^' हो जाता है। जिससे संधारित्र की प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र घट जाता है। E घटने से विभव V घट जाता है और विभव V घटने से संधारित्र की धारिता C बढ़ जाती है। इस प्रकार किसी संधारित्र की प्लेटों के बीच किसी परावैद्युत पदार्थ या परावैद्युत पट्टी को रखने से संधारित्र की धारिता (C) बढ़ जाती है अर्थात आवेश संग्रहण की क्षमता बढ़ जाती है।


परावैद्युत का ध्रुवण (Polarisation of Dielectric)

कोई भी माध्यम या पदार्थ अणु व परमाणुओं से मिलकर बनता है। परमाणुओं में धन आवेश उसके नाभिक में केंद्रित होता है तथा ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉन परमाणु के चारों ओर की कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते हैं। परावैद्युत पदार्थ में इलेक्ट्रॉन नाभिक से दृढ़ता पूर्वक बंधे होते हैं। जब किसी परावैद्युत पदार्थ को किसी संधारित्र की प्लेटों के बीच रख दिया जाता है तो पदार्थ के नाभिक (एक सिरा धन वाला) विद्युत क्षेत्र की दिशा की ओर तथा इलेक्ट्रॉन (दूसरा सिरा ऋण वाला) विद्युत क्षेत्र की दिशा के विपरीत दिशा में विस्थापित हो जाते हैं अर्थात परावैद्युत पदार्थ का प्रत्येक परमाणु ध्रुवित हो जाता है। परावैद्युत के परमाणुओं का इस प्रकार विस्थापित होने की घटना परावैद्युत पदार्थ का ध्रुवण कहलाता है तथा पदार्थ को ध्रुवित पदार्थ कहते हैं।


परावैद्युत सामर्थ्य (Dielectric Strength)

किसी पदार्थ के लिए वह अधिकतम विद्युत क्षेत्र जिसे पदार्थ बिना विद्युत भंजन के सहन कर सकता है। उस पदार्थ की परावैद्युत सामर्थ्य कहलाती है।

किसी संधारित्र की प्लेटों के बीच वह अधिकतम विभवांतर जिस पर प्लेटों के बीच रखे परावैद्युत पदार्थ में भंजन होने लगता है भंजक विभवांतर कहलाता है।


विद्युत भंजन (Electrical Breakdown)

संधारित्र की प्लेटों के बीच रखे परावैद्युत पदार्थ को अधिकतम विद्युत क्षेत्र देने से परावैद्युत के परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन अलग होकर गति करने लगते हैं, और चालकीय पथ बना लेते हैं। इस घटना को पदार्थ का विद्युत भंजन कहते हैं।


आवेशित संधारित्र की स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy of a Charged Capacitor)

जब किसी संधारित्र को आवेशित किया जाता है तो बाह्य कर्ता द्वारा आवेश देने में कुछ कार्य करना पड़ता है। यही कार्य संधारित्र में विद्युत स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।

माना C धारिता वाले संधारित्र को q^' आवेश देने पर उसका विभवांतर V^' हो तो संधारित्र को अल्प आवेश dq देने में किया गया कार्य —


dW=आवेश×विभव
dW=dq×V^'
dW=dq×q^'/C ,eq(1)
अतः संधारित्र को 0 से q आवेश देने में किया गया कार्य —
W=∫_0^q▒dW=∫_0^q▒〖q^'/C×dq〗=1/C
∫_0^q▒q'dq
W=1/C [q^'2/2]_0^q
W=1/C [q^2/2-0]
W=1/2 q^2/C
चूंकि यही कार्य संधारित्र में “विद्युत स्थितिज ऊर्जा” के रूप में संचित होता है।
∴W=U
U=1/2 q^2/V ,eq(1)
∵V=q⁄C⇒ q=CV
∴U=1/2 (CV)V
U=1/2 CV^2,eq(2)
∵C=q/V
U=1/2 q^2/((q/V) )
U=1/2 q/V ,eq(3)
Therefore,U=1/2 qV=1/2 q^2/V=1/2 CV^2

संधारित्र की धारिता को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting the Capacitance of a Capacitor)

किसी संधारित्र की धारिता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है:
(1) प्लेटों के क्षेत्रफल पर —

संधारित्र की धारिता प्लेटों के क्षेत्रफल के A अनुक्रमानुपाती होती है। अर्थात —
C∝A

(2) प्लेटों के बीच की दूरी पर —

संधारित्र की धारिता प्लेटों के बीच की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है। अर्थात —
C∝1/d

(3) प्लेटों के बीच के माध्यम पर —

संधारित्र की धारिता प्लेटों के बीच के माध्यम के परावैद्युतांक के अनुक्रमानुपाती होती है। अर्थात —
C∝K


संधारित्रों का संयोजन (Combinations of Capacitors)

संधारित्रों की धारिता बढ़ाने या घटाने के लिए संधारित्रों को जोड़ना संधारित्रों का संयोजन कहलाता है। संधारित्रों के संयोजन से विभिन्न विद्युत परिपथों में अभीष्ट धारिता प्राप्त की जा सकती है।
संधारित्रों का संयोजन मुख्यतः दो प्रकार से होता है

  1. श्रेणी क्रम संयोजन
  2. समांतर क्रम संयोजन

1. संधारित्रों का श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination of Capacitors)

संधारित्रों के संयोजन में पहले संधारित्र की पहली धन प्लेट A को विद्युत स्त्रोत से तथा दूसरी प्लेट (ऋण) को दूसरे संधारित्र की पहली (धन) प्लेट से तथा दूसरी (ऋण) प्लेट को तीसरे संधारित्र की पहली (धन) प्लेट से जोड़ देते हैं, और बाद में तीसरी संधारित्र की तीसरी (ऋण) प्लेट को पृथ्वी से जोड़ देते हैं। तो इस प्रकार के संयोजन को संधारित्रों का श्रेणीक्रम संयोजन कहते हैं।

माना तीन संधारित्र P, Q, R श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। जिनकी धारिताएं क्रमशः C1, C2, तथा C3 तथा संधारित्रों की प्लेटों के बीच विभवान्तर क्रमशः V1, V2, V3, हैं। संयोजन के बिन्दु A को विद्युत स्त्रोत के धन टर्मिनल से तथा बिन्दु B को पृथ्वी से सम्बन्धित कर देते हैं।

जब संधारित्र P की पहली प्लेट को +q आवेश दिया जाता है तो प्रेरण के कारण दूसरी प्लेट के भीतरी तल पर -q आवेश उत्पन्न हो जाता है और स्वतंत्र आवेश +q दूसरे संधारित्र Q की पहली प्लेट पर चला जाता है। इसी तरह से तीनों संधारित्रों की पहली प्लेटों पर +q आवेश तथा दूसरी प्लेटों पर -q आवेश अर्थात समान परिमाण q तथा विपरीत प्रकृति का आवेश उत्पन्न हो जाता है।

अब पहले संधारित्र P की प्लेटों के बीच विभवान्तर
V_1=q/C_1 ,समी(1)
दूसरे संधारित्र Q की प्लेटों के बीच विभवान्तर
V_2=q/C_2 ,समी(2)
इसी प्रकार तीसरे संधारित्र R की प्लेटों के बीच विभवान्तर
V_3=q/C_3 ,समी(3)
यदि बिंदुओं A व B के बीच कुल विभवान्तर V हो तो
V= V_1+V_2+V_3
समीकरण (1), (2) व (3) से
V=q/C_1 +q/C_2 +q/C_3
V=q[1/C_1 +1/C_2 +1/C_3 ] समी(4)

अब माना तीनों संधारित्रों के स्थान पर इनके तुल्य एक ऐसा संधारित रख दिया जाए जिसको q आवेश देने पर विभव V हो तो

V=q/C,समी(5)
समीकरण (4) और (5) से
q/C=q[1/C_1 +1/C_2 +1/C_3 ]
1/C=1/C_1 +1/C_2 +1/C_3

अतः स्पष्ट है कि कई संधारित्रों को श्रेणीक्रम में जोड़ने पर उनके तुल्य संधारित्र की धारिता का व्युत्क्रम, उन संधारित्रों की अलग-अलग धारिताओं के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है। अतः संधारित्रों को श्रेणीक्रम में जोड़कर धारिता घटाई जा सकती है।


2. संधारित्रों का समांतर क्रम संयोजन (Parallel Combination of Capacitors)

संधारित्रों के संयोजन में जब सभी संधारित्रों की पहली धन प्लेटों को एक बिन्दु A पर विद्युत स्त्रोत से तथा दूसरी ऋण प्लेटों को दूसरे बिन्दु B से जोड़ देते हैं, और बाद में तीसरी संधारित्र की तीसरी (ऋण) प्लेट को पृथ्वी से जोड़ देते हैं। तो इस प्रकार के संयोजन को संधारित्रों का समांतर क्रम संयोजन कहते हैं।

माना तीन संधारित्र P, Q, R बिंदुओं A व B के बीच समांतर क्रम में जुड़े हैं। जिनकी धारिताएं क्रमशः C1, C2, तथा C3 हैं। संयोजन के बिन्दु A को विद्युत स्त्रोत के धन टर्मिनल से तथा बिन्दु B को पृथ्वी से सम्बन्धित कर देते हैं।

जब बिन्दु A को +q आवेश दिया जाता है तो यह आवेश उनकी धारिताओं के अनुसार तीनों संधारित्रों की पहली प्लेटों पर माना क्रमशः +q1, +q2 तथा +q3, हो जाता है। प्रेरण के कारण दूसरी प्लेटों के भीतरी तल पर -q आवेश उत्पन्न हो जाता है। इसी तरह से तीनों संधारित्रों की पहली प्लेटों पर क्रमशः +q1, +q2, +q3 आवेश तथा दूसरी प्लेटों पर क्रमशः -q1, -q2, -q3 आवेश अर्थात समान परिमाण तथा विपरीत प्रकृति का आवेश उत्पन्न हो जाते हैं।

चूंकि तीनों संधारित्र बिन्दु A व बिन्दु B के बीच जुड़े हैं। अतः प्रत्येक संधारित्र की प्लेटों के बीच समान विभवांतर माना V होगा।

अब पहले संधारित्र P पर आवेश
q_1=C_1 V,समी(1)
दूसरे संधारित्र Q पर आवेश
q_2=C_2 V,समी(2)
तीसरे संधारित्र R पर आवेश
q_3=C_3 V,समी(3)
यदि बिंदुओं A व B के बीच कुल आवेश q हो तो
q=q_1+q_2+q_3
समीकरण (1), (2) व (3) से
q=C_1 V+C_2 V+C_3 V
q=V[C_1+C_2+C_3 ] समी(4)

अब माना तीनों संधारित्रों के स्थान पर इनके तुल्य एक ऐसा संधारित्र रख दिया जाए जिसको q आवेश देने पर विभव V हो तो


q=CV,समी(5)
समीकरण (4) और (5) से
CV=V[C_1+C_2+C_3 ]
C=C_1+C_2+C_3

अतः स्पष्ट है कि कई संधारित्रों को समांतर में जोड़ने पर उनकी तुल्य धारिता, उन संधारित्रों की अलग-अलग धारिताओं के योग के बराबर होती है। अतः संधारित्रों को समांतर में जोड़कर धारिता बढ़ाई जा सकती है।


अध्याय 4 संधारित्र तथा परावैद्धुत (Complete Theory) | भौतिक विज्ञान कक्षा 12 || Handwritten Notes































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