23 परमाणु की सरंचना एवं स्पेक्ट्रमों की उत्पत्ति || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 23 notes in Hindi

23 परमाणु की सरंचना एवं स्पेक्ट्रमों की उत्पत्ति  || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 23 notes in Hindi

23 परमाणु की सरंचना एवं स्पेक्ट्रमों की उत्पत्ति || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 23 notes in Hindi

23 Chapter Physics Theory class 12th

अध्याय 12

डाल्टन का परमाणु मॉडल या सिद्धांत :–

सर्वप्रथम 1808 ईस्वी में डाल्टन ने द्रव्यों की संरचना से संबंधित एक परमाणु मॉडल या सिद्धांत प्रतिपादित किया। डाल्टन के परमाणु मॉडल के अनुसार, “प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है, जिन्हें परमाणु कहते हैं। परमाणु अविभाज्य कण है। परमाणु को किसी भी भौतिक अथवा रासायनिक विधि द्वारा विभाजित नहीं किया जा सकता है। परमाणुओं मिलकर द्रव्य के अणुओं का निर्माण करते हैं।”

टॉमसन का परमाणु मॉडल या सिद्धांत :–

सन 1904 ईस्वी में ब्रिटिश के वैज्ञानिक जोसेफ जे थॉमसन ने परमाणु की संरचना से संबंधित एक परमाणु मॉडल या सिद्धांत प्रस्तुत किया। जिसे थॉमसन का परमाणु मॉडल कहते हैं। टॉमसन के परमाणु मॉडल के अनुसार, “प्रत्येक परमाणु 10^(-10) मीटर त्रिज्या का एक धनावेशित ठोस गोला होता है। जिसमें परमाणु का संपूर्ण धनावेश तथा द्रव्यमान एकसमान रूप से वितरित रहता है। इस गोले के अंदर जगह-जगह पर इलेक्ट्रॉन इस प्रकार धंसे रहते हैं जिस प्रकार की तरबूज में उसके बीज धंसे होते हैं। परमाणु में धन आवेश तरबूज के खाए जाने वाले लाल भाग की भांति एक समान रूप से तथा ऋण आवेश तरबूज में धंसे हुए बीजों के समान जगह-जगह पर वितरित होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉनों का कुल ऋणावेश, परमाणु के कुल धनावेश के बराबर होता है। इसे थॉमसन का तरबूज मॉडल भी कहते हैं।

टॉमसन के परमाणु मॉडल के दोष :–

 यह मॉडल परमाणु के स्पेक्ट्रम को नहीं समझ सका।

 इस मॉडल के आधार पर अल्फा कणों के प्रकीर्णन की व्याख्या नहीं की जा सकी।

रदरफोर्ड का α-कण प्रकीर्णन प्रयोग :–

सन 1911 ईस्वी में रदरफोर्ड तथा उनके दो सहयोगी एच गाइगर तथा ई मार्सडेन ने कुछ प्रयोग किये। जिसमें उन्होंने रेडियोएक्टिव पदार्थ रेडियम से उत्सर्जित होने वाले उच्च गतिज ऊर्जा वाले अल्फा कणों की बौछार एक पतली सोने की पन्नी पर कराई। उन्होंने इस पूरे प्रयोग को निर्वात में किया। प्रयोग में देखा गया कि सोने की पन्नी अर्थात स्वर्ण पत्र से टकराकर अल्फा कण अपने मार्ग से विक्षेपित होकर प्रकीर्णित हो जाते हैं। चूंकि इस क्रिया में अल्फा कणों का प्रकीर्णन होता है। अतः इसे रदरफोर्ड का α-कण प्रकीर्णन प्रयोग कहते हैं। स्वर्ण पत्र से विभिन्न कोणों पर विक्षेपित अल्फा कणों को प्रस्फुर गणित्र संसूचक द्वारा गिना लिया गया।

रदरफोर्ड का α-कण प्रकीर्णन प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष :–

परमाणु की संरचना को समझने के लिए रदरफोर्ड नामक वैज्ञानिक ने एक स्वर्ण पत्र पर अल्फा कणों की बौछार कराई। जिसके आधार पर रदरफोर्ड ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त किए :

 अधिकांश अल्फा कण बिना विचलित हुए स्वर्ण पत्र को भेद कर सीधे बाहर निकल जाते हैं। जिससे रदरफोर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि परमाणु के अंदर अधिकांश भाग खोखला होता है। जबकि टॉमसन ने बताया था कि परमाणु भीतर से ठोस धनावेशित गोला होता है।

 कुछ अल्फा कण अपने मार्ग से थोड़ा सा विचलित होकर विभिन्न दिशाओं में बिखर जाते है। जिससे रदरफोर्ड ने यह निष्कर्ष निकाला कि परमाणु का समस्त धनावेश एक सूक्ष्म स्थान में केंद्रित होता है। जबकि थॉमसन ने परमाणु का समस्त धनावेश एकसमान रूप से वितरित बताया था।

 कुछ अल्फा कण बहुत बड़े कोण (90-180) के साथ प्रकीर्णित होकर वापस लौट आते हैं। जिससे यह पता चलता है कि परमाणु का समस्त धनावेश तथा द्रव्यमान परमाणु के अंदर अत्यंत कम आयतन (छोटे भाग) में सीमित होता है जिसे नाभिक कहते हैं।

 रदरफोर्ड के α-कण प्रकीर्णन प्रयोग से इस बात की भी पुष्टि होती है कि कूलाम का नियम परमाण्वीय दूरियों के लिए भी सत्य है।

रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल या सिद्धांत :–

अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग के आधार पर रदरफोर्ड ने परमाणु संरचना का नाभिकीय सिद्धांत प्रस्तुत किया। रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल के अनुसार :

 परमाणु का समस्त धन आवेश एक अत्यंत सूक्ष्म भाग (आयतन) में केंद्रित रहता है। जिसे परमाणु का नाभिक कहते हैं। नाभिक का व्यास 10^(-12) सेंमी से भी कम होता है। इसी नाविक में परमाणु के सारे प्रोटॉन (धनावेश) होते हैं।

 परमाणु में नाभिक के बाहर अधिकांश भाग खोखला होता है जिसमें इलेक्ट्रॉन वितरित रहते हैं। इसी रिक्त स्थान से बहुत से अल्फा कण सीधे बाहर गुजर जाते हैं। परमाणु के नाभिक में जितने प्रोटॉन होते हैं, नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की उतनी ही संख्या होती है। अतः सामान्य अवस्था में परमाणु विद्युत उदासीन होता है।

 परमाणु का समस्त धनावेश तथा द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित होता है।

 नाभिक के बाहर चारों ओर बंद वृत्तीय कक्षाएं होती हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं। अतः इलेक्ट्रॉन को गृहीय इलेक्ट्रॉन भी कहा जाता है।

 परिक्रमण/घूर्णन से उत्पन्न अभिकेंद्र बल, नाभिक-इलेक्ट्रॉन के आकर्षण बल को संतुलित रखता है। अतः इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक में नहीं गिरता है।

रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की कमियां :–

हाइ‌ड्रोजन परमाणु की स्पेक्ट्रमी रेखाएँ :-

जब हाइड्रोजन परमाणु को बाहर से कोई ऊर्जा मिलती है (जैसे गर्म करने पर) तो उसके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हो जाते हैं। ऊर्जा पाकर प्रत्येक परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन मूल ऊर्जा स्तर से अधिक ऊर्जा स्तर की उत्तेजित हो जाता है और अपनी कक्षा को छोड़कर दूसरी उच्च कक्षा में प्रवेश करता है। जहां से वह 10^(-8) सेकंड पश्चात वापस अपनी कक्षा में लौट आता है। जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर में वापस आता है तो वह ऊर्जा का उत्सर्जन विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में करता है, जो विशिष्ट तरंगदैर्ध्य के रूप में स्पेक्ट्रम रेखाओं के रूप में दिखाई देता है। इस घटना से रेखाओं की श्रेणियां प्राप्त होती हैं जिसे स्पेक्ट्रम (श्रेणीक्रम) कहते हैं।

उत्सर्जन स्पेक्ट्रम :- हाइ‌ड्रोजन परमाणु में जब कभी इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर में संक्रमण करता है तो दोनों ऊर्जा स्तरों की ऊर्जाओं के बराबर ऊर्जा वाला विकिरण उत्सर्जित होता है। जिसका एक निश्चित तरंगदैर्ध्य होता है। इसे एक स्पेक्ट्रमी रेखा कहते है।

हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की विभिन्न श्रेणियों के लिए तरंगदैर्ध्य का सूत्र :–

हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की विभिन्न श्रेणियों की व्याख्या क्वांटम सिद्धांत के अनुसार की जाती है। क्वांटम सिद्धांत के अनुसार यदि हाइड्रोजन परमाणु की आयनिक अवस्था को शून्य ऊर्जा स्तर माना जाये तो परमाणु के विभिन्न ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा को निम्न सूत्र व्यक्त किया जा सकता है।

E_n=-Rhc/n^2 or E_n=(-13.6)/n^2 eV

हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की विभिन्न श्रेणियां — अ

हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम को इलेक्ट्रॉन के विभिन्न ऊर्जा स्तरों के संक्रमण के आधार पर निम्नलिखित पांच मुख्य श्रेणियां में विभाजित किया गया है जो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में स्थित होती हैं।

लाइमन श्रेणी (n=1) पराबैगनी प्रकाश

बामर श्रेणी (n=2) दृश्य प्रकाश

पाश्चन श्रेणी (n=3) अवरक्त प्रकाश

ब्रैकेट श्रेणी (n=4) अवरक्त प्रकाश

फुण्ड श्रेणी (n=5) अवरक्त प्रकाश

लाइमन श्रेणी (n=1) :–

“जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से प्रथम ऊर्जा स्तर (n=1) में प्रवेश करता है या आता है तो इससे प्राप्त श्रेणी को लाइमन श्रेणी कहते हैं।”

"जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर में गति करते हैं तो स्पेक्ट्रमी रेखाएं पराबैंगनी क्षेत्र में पड़ती है स्पेक्ट्रमी रेखाओं की इन संख्या को लाइमन श्रेणी कहते है।"

"इलेक्ट्रॉन के बाहरी कक्षा से पहली कक्षा में संक्रमण करते हैं तो स्पेक्ट्रमी रेखाएं पराबैंगनी क्षेत्र में पड़ती है स्पेक्ट्रमी रेखाओं की इन संख्या को लाइमन श्रेणी कहते है।"

“जब इलेक्ट्रॉन का संक्रमण उच्च ऊर्जा स्तर से प्रथम ऊर्जा स्तर में होता है तो प्राप्त श्रेणी को लाइमन श्रेणी कहते हैं।”

1/λ=R[1/(n_1^2 )-1/(n_2^2 )],n_1=1; n_2=2,3,4,…

or 1/λ=R[1/1^2 -1/(n_i^2 )],n_i=2,3,4,5 …

बामर श्रेणी (n=2) :–

“जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर (n=2) में प्रवेश करता है या आता है तो इससे प्राप्त श्रेणी को बामर श्रेणी कहते हैं।”

"जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर में गति करते हैं तो स्पेक्ट्रमी रेखाएं दृश्य क्षेत्र में पड़ती है स्पेक्ट्रमी रेखाओं की इन संख्या को बामर श्रेणी कहते है।"

“जब इलेक्ट्रॉन का संक्रमण उच्च ऊर्जा स्तर से द्वितीय ऊर्जा स्तर में होता है तो प्राप्त श्रेणी को बामर श्रेणी कहते हैं।”

  1/λ=R[1/2^2 -1/(n_i^2 )],n_i=3,4,5,…

पाश्चन श्रेणी (n=3) :–

“जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से तीसरे ऊर्जा स्तर (n=3) में प्रवेश करता है या आता है तो इससे प्राप्त श्रेणी को पाश्चन श्रेणी कहते हैं।”

"जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से तीसरे ऊर्जा स्तर में गति करते हैं तो स्पेक्ट्रमी रेखाएं अवरक्त क्षेत्र में पड़ती है स्पेक्ट्रमी रेखाओं की इन संख्या को पाश्चन श्रेणी कहते है।"

“जब इलेक्ट्रॉन का संक्रमण उच्च ऊर्जा स्तर से तृतीय ऊर्जा स्तर में होता है तो प्राप्त श्रेणी को पाश्चन श्रेणी कहते हैं।”

1/λ=R[1/3^2 -1/(n_i^2 )],n_i=4,5,6,…

ब्रैकेट श्रेणी (n=4) :–

“जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से चौथे ऊर्जा स्तर (nन) में प्रवेश करता है या आता है तो इससे प्राप्त श्रेणी को ब्रैकेट श्रेणी कहते हैं।”

"जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से चौथे ऊर्जा स्तर में गति करते हैं तो स्पेक्ट्रमी रेखाएं अवरक्त क्षेत्र में पड़ती है स्पेक्ट्रमी रेखाओं की इन संख्या को ब्रैकेट श्रेणी कहते है।"

“जब इलेक्ट्रॉन का संक्रमण उच्च ऊर्जा स्तर से चतुर्थ ऊर्जा स्तर में होता है तो प्राप्त श्रेणी को ब्रैकेट श्रेणी कहते हैं।”

1/λ=R[1/4^2 -1/(n_i^2 )],n_i=5,6,7,…

फुण्ड श्रेणी (n=5) :–

“जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से पांचवें ऊर्जा स्तर (n=5) में प्रवेश करता है या आता है तो इससे प्राप्त श्रेणी को फुण्ड श्रेणी कहते हैं।”

"जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से पांचवें ऊर्जा स्तर में गति करते हैं तो स्पेक्ट्रमी रेखाएं अवरक्त क्षेत्र में पड़ती है स्पेक्ट्रमी रेखाओं की इन संख्या को फुण्ड श्रेणी कहते है।"

“जब इलेक्ट्रॉन का संक्रमण उच्च ऊर्जा स्तर से पांचवें ऊर्जा स्तर में होता है तो प्राप्त श्रेणी को फुण्ड श्रेणी कहते हैं।”

1/λ=R[1/5^2 -1/(n_i^2 )],n_i=6,7,8,…


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