28 अंकीय इलेक्टानिकी || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 28 notes in Hindi
28 अंकीय इलेक्टानिकी || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 28 notes in Hindi
28 अंकीय इलेक्टानिकी || हिंदी नोट्स || Kumar Mittal Physics class 12 chapter 28 notes in Hindi
28 Chapter Physics Theory class 12th
27 Chapter Physics Theory class 12th
इलेक्ट्रॉनिकी (Electronics) :–
भौतिक विज्ञान की वह शाखा जिसमें विद्युत राशियों (धारा, वोल्टेज, शक्ति आदि) के प्रवर्धन, दोलन, माडुलन, दिष्टीकरण आदि का अध्ययन किया जाता है, इलेक्ट्रॉनिकी की कहलाती है।
पाउली का अपवर्जन नियम :–
जैसा कि हम जानते हैं की पद्धति में इलेक्ट्रॉन प्रमाण के नाभिक के चारों ओर निश्चित वृताकार कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं जिन्हें कोर्स या ऊर्जा स्तर कहते हैं।
पावली के अपवर्जन के नियम से किसी कोष में इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2n² के बराबर होती हैं जैसे –
K (n=1) तो कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या= 2,
L (n=2) तो कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या= 8,
M (n=3) तो कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या= 16,
N (n=4) तो कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या= 32,
इन कोषों को आगे और विभाजित किया जाता है जिन्हें उपकोश (कक्षक) कहते हैं अर्थात कोषों को उपकोश में बांटा जाता है। जैसे – s, p, d, f.
s कक्षक (गोलाकार) :–
अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2
p कक्षक (डम्बलाकार) :–
अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 6
d कक्षक (द्विडम्बलाकार) :–
अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 8
f कक्षक (जटिल) :–
अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 14
बद्ध इलेक्ट्रॉन :–
वे इलेक्ट्रॉन जो नाभिक से प्रबल बल द्वारा बंधे होते हैं, बद्ध इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं। ये आंतरिक ऊर्जा स्तरों में पाए जाते हैं। इन्हें परमाणुओं से बाहर निकलना मुश्किल होता है।
मुक्त इलेक्ट्रॉन :–
वे इलेक्ट्रॉन जो परमाणु की बाहरी ऊर्जा स्तरों में पाए जाते हैं तथा जो दुर्बल बल से बंधे होते हैं, मुक्त इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं। बाह्य ऊर्जा मिलने पर परमाणु से निकलकर ये पदार्थ में स्वतंत्र रूप से विचरण (गति) करते हैं।
जर्मेनियम एवं सिलिकॉन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ऑफबाऊ नियम
ऊर्जा बैंड सिद्धान्त :–
जब दो या दो से अधिक परमाणुओं को एक दूसरे के नजदीक लाते हैं तो बाह्यतम ऊर्जा स्तर अतिव्यापन कर जाता है (आपस में मिल जाता है/अध्यारोपण कर जाते हैं)। जब इन परमाणुओं के बीच की दूरी और कम की जाती है तो बाह्यतम ऊर्जा स्तर दो ऊर्जा स्तरों में टूट/बट जाता है। एक मूल ऊर्जा स्तर से नीचे तथा दूसरा मूल ऊर्जा स्तर से ऊपर। इनमें नाभिक से नजदीक वाले ऊर्जा स्तर को अर्थात मूल ऊर्जा स्तर से नीचे वाले ऊर्जा स्तर को संयोजी ऊर्जा स्तर या संयोजी ऊर्जा बैंड कहते हैं। नाभिक से दूर वाले ऊर्जा स्तर अर्थात मूल ऊर्जा स्तर से ऊपर वाले ऊर्जा स्तर को संयोजी ऊर्जा स्तर या संयोजी ऊर्जा बैंड कहते हैं। दोनों ऊर्जा स्तरों के बीच अंतराल (गैप) को वर्जित ऊर्जा अंतराल कहते हैं। यही ऊर्जा बैंड सिद्धांत है।
Note:– भौतिक विज्ञान के अंतर्गत ठोस पदार्थों में इलेक्ट्रॉनों की अवस्थाओं का वर्णन करने वाला वह सिद्धांत जिसमें ऊर्जा के मान कुछ विशिष्ट सीमाओं में ही हो सकते हैं, ठोसे का ऊर्जा बैंड सिद्धांत कहलाता है। अर्थात ठोसों का ऊर्जा बैंड सिद्धांत धातु के ठोस पदार्थ के अंदर इलेक्ट्रॉनों की क्वांटम अवस्था को समझाता है।
ऊर्जा स्तर :–
जिन निश्चित कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते हैं, उन्हें ऊर्जा स्तर कहते हैं। इन्हें K, L, M, N या 1, 2, 3, 4 से प्रदर्शित करते हैं। इलेक्ट्रॉन की कक्षीय ऊर्जा केवल मुख्य क्वांटम संख्या पर निर्भर करती है।
किसी पृथक्करण परमाणु में उनके विभिन्न इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा के कुछ निश्चित भिन्न-भिन्न मान होते हैं उसे (निश्चित मान को) उनकी ऊर्जा स्तर कहते हैं।
ठोसों में ऊर्जा बैंड —
प्रत्येक पदार्थ बहुत सारे परमाणुओं से मिलकर बना होता है। परमाणु के अंदर एक भारी भाग होता है, जिसे नाभिक कहते हैं। नाभिक के चारों ओर बहुत सारी वृत्तीय कक्षाएं होती हैं। जिनमें इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं। नाभिक धनात्मक तथा इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक होते हैं। पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों की गति प्रथक्कृत परमाणु में इलेक्ट्रॉन की गति से भिन्न होती है। जब बहुत सारे परमाणु मिलकर किसी ठोस की रचना करते हैं तो इन परमाणुओं के नाभिक-नाभिक इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक-इलेक्ट्रॉन के बीच आकर्षण प्रतिकर्षण बलों के कारण अन्योंन क्रियाएं होती हैं। जिससे इन परमाणुओं में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर बहुत सारे ऊर्जा स्तरों में विभक्त हो जाते हैं। ये उर्जा स्तर एक बैंड (पट्टी) का रूप ले लेते हैं। जिन्हें ऊर्जा बैंड कहते हैं।
Note : अन्योंन क्रिया —
जब कोई एक वस्तु दूसरी वस्तु पर बल लगाकर उसे प्रभावित करती है तो पहले वस्तु तथा दूसरी वस्तु के बीच की क्रिया को क्रिया कहते हैं।
ऊर्जा बैंड के प्रकार —
ऊर्जा बैंड निम्नलिखित प्रकार के होते हैं।
(1) संयोजी बैंड –
वह ऊर्जा बैंड जिसमें संयोजी इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर उपस्थित होते हैं। उसे संयोजी बैंड कहते हैं।
(2) चालन बैंड –
वह ऊर्जा बैंड जिसमें चालन इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर उपस्थित होते हैं। उसे चालन बैंड कहते हैं।
वर्जित ऊर्जा अंतराल —
संयोजी बैंड और चालन बैंड के मध्य एक रिक्त स्थान होता है। जिसे वर्जित ऊर्जा अंतराल कहते हैं।
NOTE — वर्जित ऊर्जा अंतराल में कोई इलेक्ट्रॉन उपस्थित नहीं होता है।
ठोसे में ऊर्जा बैंड के आधार पर चालक, अचालक और अर्द्धचालक —
चालक —
वे पदार्थ जिनके चालन बैंड आंशिक रूप से इलेक्ट्रानों से भरे होते हैं। अर्थात पर्याप्त मात्रा में चालक इलेक्ट्रॉन होते हैं। जिससे उनमें धारा का प्रवाह आसानी से हो जाता है। उन्हें चालक कहते हैं। जैसे चांदी, तांबा एल्यूमिनियम आदि। चालक पदार्थ में चालन बैंड और संयोजी बैंड अतिव्यापित (सटे हुए) होते हैं। चालन बैंड व संयोजी बैंड के बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल नगण्य या बहुत कम (Eg ≤0.07 eV) होता है। जैसे लोहा आदि।
अचालक —
वे पदार्थ जिनके संयोजी बैंड तो इलेक्ट्रानों से भरे होते हैं परंतु चालन बैंड बिल्कुल खाली होते हैं अर्थात चालन बैंड में कोई भी इलेक्ट्रॉन नहीं पाया जाता है। जिससे उनमें धारा का प्रवाह नहीं हो पाता है। उन्हें अचालक कहते हैं। जैसे लकड़ी, प्लास्टिक, कांच, अभ्रक आदि। अचालक पदार्थ में चालन बैंड और संयोजी बैंड दूर दूर होते हैं। इनमें चालन बैंड व संयोजी बैंड के बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल 3 eV से अधिक(Eg ≥3 eV) होता है। उनको अचालक कहते हैं। जैसे कांच प्लास्टिक लकड़ी आदि।
अर्द्धचालक —
वे पदार्थ जिनके संयोजी बैंड पूर्णतः इलेक्ट्रानों से भरे होते हैं परंतु चालन बैंड पूर्णतः खाली होते हैं अर्थात चालन बैंड में कोई भी इलेक्ट्रॉन नहीं पाया जाता है।
जब अर्द्धचालकों का ताप बढ़ा देते हैं तो संयोजी बैंड से कुछ इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में चले जाते हैं और इन पदार्थों में धारा प्रवाहित होने लगती है। या इनमें कुछ अपद्रव्य मिला देने पर सहसंयोजी बैंड टूट जाते हैं, और संयोजी बैंड से इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में चले जाते हैं और धारा प्रवाहित होने लगती है। उन्हें अर्द्धचालक कहते हैं। जैसे जर्मेनियम, सिलिकॉन, कार्बन आदि।
अचालक पदार्थ में चालन बैंड और संयोजी बैंड दूर दूर होते हैं। इनमें चालन बैंड और संयोजी बैंड के बीच वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत कम (Eg ≈ 1 eV) होता है अर्थात लगभग 1 eV के बराबर होता है।
कोटर या होल (hole) की अवधारणा —
ऊर्जा बैंड के सिद्धांत में हम पढ़ चुके हैं कि जब दो या दो से अधिक परमाणु एक दूसरे के नजदीक समीप ले जाते हैं तो वह खत्म ऊर्जा स्तर फैल जाता है परमाणु के बीच की दूरी और काम करने पर ऊर्जा स्तर अति विप कर जाते हैं यदि परमाणुओं के बीच की दूरी और काम कर दी जाए तो बाह्यतम ऊर्जा स्तर दो भागों टुकड़ों में विभाजित हो जाता है अर्थात दो ऊर्जा स्तरों में बट जाता है एक उनमें से एक मूल ऊर्जा स्तर के ठीक नीचे तथा दूसरा मूल ऊर्जा स्तर के ठीक ऊपर होता है मूल ऊर्जा स्तर के ठीक नीचे वाला ऊर्जा स्तर संयुक्त ऊर्जा स्तर कहलाता है जबकि मूल ऊर्जा स्तर के ठीक है ऊपर वाला ऊर्जा स्तर चलन ऊर्जा स्तर कहलाता है अर्थात निम्न ऊर्जा स्तर को संयुक्त ऊर्जा स्तर तथा उच्च ऊर्जा स्तर को चालान ऊर्जा स्तर कहते हैं परम शून्य ताप से ऊपर के ताप पर या सामान्य ताप पर तो संयोग बंद में से कुछ सहसंयोजक बंध टूटते हैं तो इलेक्ट्रॉन संयुक्त बंद से चालन बैंड में चले जाते हैं जैसे ही एक बंधु टूटता है तो इलेक्ट्रॉन संयुक्त बंद से चालन बैंड में चला जाता है तथा उसे स्थान पर एक इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है इलेक्ट्रॉन की कमी को इलेक्ट्रॉन रिक्ति कहा जाता है इलेक्ट्रॉन रीती को ही कोटा या हॉल कहते हैं यह कोटा या हॉल धनावेशित कान की तरह व्यवहार करता है इसका प्रभावित द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान से अधिक है हालांकि उनकी गतिशीलता इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता से कम होती है जिस प्रकार मुक्त इलेक्ट्रॉन पदार्थ में स्वतंत्र रूप से गति करते रहते हैं ठीक है उसी प्रकार कॉटल कॉटल हॉल भी गति करते रहते हैं। उसे पदार्थ में एक इलेक्ट्रॉन की कमी हो जाती है और एक क्वार्टर हॉल का निर्माण हो जाता है।
अर्द्धचालकों के प्रकार —
अर्द्धचालक दो प्रकार के होते हैं। (1) शुद्ध अथवा निज अर्द्धचालक (2) अशुद्ध अथवा बाह्य अथवा अपद्रव्यी अर्द्धचालक।
(1) शुद्ध अथवा निज अर्द्धचालक —
ऐसे अर्द्धचालक जिनमें कोई अशुद्धि या अपद्रव्य न मिला हो शुद्ध अथवा निज अर्द्धचालक कहलाते हैं।
जर्मेनियम तथा सिलिकॉन प्राकृतिक शुद्ध अर्द्धचालक हैं।
निज अर्द्धचालकों में विद्धुत चालन —
निज अर्द्धचालकों की विद्धुत चालकता लगभग नगण्य होती है।
(2) अशुद्ध अथवा बाह्य अर्द्धचालक —
ऐसे अर्द्धचालक जिनमें कोई अशुद्धि या अपद्रव्य मिला हो, अशुद्ध अथवा बाह्य अथवा अपद्रव्यी अथवा अपमिश्रित अर्द्धचालक कहलाते हैं। अथवा वह शुद्ध अर्द्धचालक जिसमें कोई अशुद्धि मिला देते हैं। उसे अशुद्ध अर्द्धचालक कहते हैं।
इनके इलेक्ट्रॉन मुक्त नहीं होते हैं अतः इनकी चालकता नगण्य होती है। कमरे के ताप पर 109 में केवल 1 बन्ध टूटता है। जिससे 1 इलेक्ट्रॉन, धारा प्रवाहित करता है।
अशुद्धि या अपद्रव्य पदार्थ —
वे पदार्थ जिनकी संयोजकता 3 या 5 होती है। उसे अशुद्धि या अपद्रव्य या अपमिश्रण कहते हैं।
3 संयोजकता वाले अपद्रव्य — अल्युमिनियम (Al), बोरान (Ba), गैलियम (Ga), इंडियम (), थेलियम (Th) आदि।
5 संयोजकता वाले अपद्रव्य — आर्सेनिक (As), बिस्मथ (Bi), फास्फोरस (F), एंटिमनी () आदि।
अपमिश्रण /मादन (Doping) :–
अशुद्ध अथवा बाह्य अर्द्धचालक के प्रकार—
अशुद्ध अथवा बाह्य अर्द्धचालक दो प्रकार के होते हैं। (i) n टाइप अर्द्धचालक (ii) p टाइप अर्द्धचालक।
(i) n टाइप अर्द्धचालक —
जब शुद्ध अर्द्धचालक जर्मेंनियम में 5 संयोजकता वाला पदार्थ मिला दिया जाता है तो वह जर्मेंनियम के परमाणु के 4 इलेक्ट्रॉनों से सह संयोजक बन्ध बना लेते हैं तथा 1 इलेक्ट्रॉन मुक्त रह जाता है। यही आवेश वाहक होता है। इसमें अपद्रव्य पदार्थ दाता परमाणु होता है क्योंकि यह क्रिस्टल को मुक्त इलेक्ट्रॉन देता है। n टाइप अर्द्धचालक में मुक्त इलेक्ट्रॉन द्वारा धारा प्रवाहित होती है।
(ii) p टाइप अर्द्धचालक —
जब शुद्ध अर्द्धचालक जर्मेंनियम अथवा सिलिकॉन में 3 संयोजकता वाला पदार्थ मिला दिया जाता है तो इस प्रकार बने अर्द्धचालक को p टाइप अर्द्धचालक कहते हैं।
जब शुद्ध अर्द्धचालक जर्मेंनियम में 3 संयोजकता वाला पदार्थ मिला दिया जाता है तो वह जर्मेंनियम के परमाणु के 3 इलेक्ट्रॉनों से सह संयोजक बन्ध बना लेते हैं तथा 1 कोटर मुक्त रह जाता है। यही आवेश वाहक होता है। इसमें अपद्रव्य पदार्थ के परमाणु को ग्राही परमाणु कहते हैं। क्योंकि यह क्रिस्टल से मुक्त इलेक्ट्रॉन लेता है। n टाइप अर्द्धचालक में मुक्त कोटर द्वारा धारा प्रवाहित होती है।
इस प्रकार n टाइप अर्द्धचालक में बहुसंख्यक आवेश वाहक मुक्त कोटर तथा अल्पसंख्यक आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं।
डोपिंग या मादन (Doping) —
जर्मेनियम तथा सिलिकॉन प्राकृतिक शुद्ध अर्द्धचालकों में 3 या 5 संयोजकता वाला पदार्थ अपद्रव्य के रुप में मिलाने की क्रिया डोपिंग या मादन कहलाती है।
p-n सन्धि व p-n सन्धि डायोड —
जब एक p टाइप अर्द्धचालक क्रिस्टल को एक विशेष विधि (डोपिंग) द्वारा n टाइप अर्द्धचालक क्रिस्टल से जोड़ दिया जाता है तो इनके संयोजन तल को जहां पर दोनों क्रिस्टल आपस में जुड़ते हैं। उस सम्पर्क तल को p-n सन्धि कहते हैं।
चूंकि p-n सन्धि में दो सिरे होते हैं। अतः इसे डायोड कहते हैं। अतः p-n सन्धि से बने डायोड को p-n सन्धि डायोड कहते हैं। इसमें एक सिरा p एनोड(+) तथा दूसरा सिरा n कैथोड (-) होता है।
p-n सन्धि का प्रतीक —
p-n सन्धि डायोड में अवक्षय परत का बनना —
जब p टाइप अर्द्धचालक को, n टाइप अर्द्धचालक से जोड़ते हैं तो जैसे ही p-n सन्धि बनती है तो p क्षेत्र से कुछ कोटर तथा n क्षेत्र से कुछ इलेक्ट्रॉन सन्धि की ओर चलने लगते हैं अर्थात विसरण करने लगते हैं।
ये सन्धि के पास आकर एक दूसरे के पूरक आवेश वाहकों से मिलकर एक दूसरे को उदासीन कर देते हैं। आवेश वाहकों की गति के कारण सन्धि के पास एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। जिसकी दिशा n क्षेत्र से p क्षेत्र की ओर होती है। कुछ समय पश्चात यह विद्युत क्षेत्र बहुत प्रबल हो जाता है। तब इलेक्ट्रॉन वापस पीछे को गति करने लगते हैं और सन्धि के पास कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं बचता। इस प्रकार सन्धि के पास एक परत बन जाती है जिसे अवक्षय परत कहते हैं।
p-n सन्धि डायोड में धारा का प्रवाह —
बाह्य बैटरी की अनुपस्थिति में सन्धि डायोड में कोई धारा नहीं बहती है। जब इस सन्धि के सिरों को बैटरी से जोड़ा जाता है तो सन्धि में धारा प्रवाहित होने लगती है। p-n सन्धि डायोड पर बैटरी को दो प्रकार से जोड़ा जा सकता है।
(1) अग्र अभिनत या अग्र दिशिक
(2) उत्क्रम अभिनत या पश्च दिशिक
(1) अग्र अभिनत या अग्र दिशिक –
जब p-n सन्धि डायोड के p टाइप क्रिस्टल को बैटरी के धन सिरे से तथा n टाइप क्रिस्टल को बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ दिया जाता है तो सन्धि अग्र अभिनत या अग्र दिशिक कहलाती है।
अथवा यदि p-n संधि के p क्षेत्र को बैटरी के धन सिरे से एवं n क्षेत्र को बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ दें तो यह संधि अग्र अभिनत कहलाती है।
इस स्थिति में p टाइप क्रिस्टल से, n टाइप क्रिस्टल की ओर एक प्रबल बाह्य विद्युत क्षेत्र स्थापित हो जाता है। यह विद्युत क्षेत्र, आंतरिक विद्युत क्षेत्र E_i की तुलना में काफी प्रबल होता है। p क्षेत्र में कोटर तथा n क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं। जब p क्षेत्र को बैटरी के धन सिरे से तथा n क्षेत्र को बैटरी के ऋण सिरे से जोड़ देते हैं तो प्रतिकर्षण बल के कारण कोटर और इलेक्ट्रॉन दोनों सन्धि की ओर गति करने लगते हैं अर्थात चलने लगते हैं। जब एक कोटर तथा एक इलेक्ट्रॉन सन्धि के निकट आकर परस्पर (एक दूसरे से) सहयोग करके नष्ट होता है, तो ठीक उसी समय p क्षेत्र के धन सिरे के निकट एक सहसंयोजक बंध टूटता है। जिससे उत्पन्न कोटर सन्धि की ओर तथा इलेक्ट्रॉन तार द्वारा बैटरी के धन सिरे में प्रवेश करता है। ठीक उसी समय बैटरी के ऋण सिरे से एक इलेक्ट्रॉन निकलकर n क्षेत्र में प्रवेश करता है और उस इलेक्ट्रॉन का स्थान ग्रहण कर लेता है जो सन्धि के समीप नष्ट होता है। यह क्रम बार-बार चलता रहता है जिसके कारण सन्धि डायोड में एक धारा प्रवाहित होने लगती है, जिसे अग्र धारा कहते हैं। इस प्रकार की सन्धि को अग्र अभिनत या अग्र दिशिक कहते हैं।
Note : अग्र अभिनत सन्धि में कोटर व इलेक्ट्रॉन दोनों ही संधि की ओर गति करते हैं। जिससे अवक्षय परत की चौड़ाई घट जाती है इसीलिए इसमें प्रतिरोध कम होता है।
(2) उत्क्रम अभिनत या पश्च दिशिक —
जब सन्धि p-n सन्धि के p क्षेत्र (क्रिस्टल) को बैटरी के ऋण सिरे से तथा n क्षेत्र को बैटरी के धन सिरे से जोड़ा जाता है, तो सन्धि उत्क्रम अभिनत या पश्च दिशिक कहलाती है। इस स्थिति में विद्युत क्षेत्र n से p की ओर दिष्ट होता है।
अथवा यदि p-n संधि के p क्षेत्र को बैटरी के ऋण सिरे से एवं n क्षेत्र को बैटरी के धन सिरे से जोड़ दें तो यह संधि उत्क्रम अभिनत कहलाती है।
उत्क्रम अभिनत सन्धि में p क्षेत्र के कोटर तथा n क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन दोनों ही सन्धि से दूर की ओर गति करने लगते हैं और ये सन्धि तक कभी नहीं पहुंच पाते हैं। जिससे सन्धि में बहुसंख्यक वाहकों से कोई धारा नहीं बहती है। जब सन्धि उत्क्रम अभिनत होती है तो सन्धि में एक अल्प धारा बहती है, जिसे उत्क्रम धारा कहते हैं। यह अल्पसंख्यक वाहकों से उत्पन्न होती है।
Note : उत्क्रम अभिनत में कोटर व इलेक्ट्रॉन दोनों ही सन्धि से दूर की ओर गति करते हैं। जिससे अवक्षय परत की चौड़ाई बढ़ जाती है जिससे प्रतिरोध बहुत अधिक हो जाता है।
उत्क्रम या पश्च दिशिक धारा सन्धि के ताप पर निर्भर करती है। ताप बढ़ाने पर बढ़ती है।
ऐवेलांश वोल्टेज —
जब उत्क्रम (पश्च दिशिक) वोल्टेज को लगातार बढ़ाते जाते हैं तब उत्क्रम धारा का मान एकाएक (अचानक) बढ़ जाता है। इस घटना को ऐवेलांश भंजन कहते हैं। जिस वोल्टेज पर ऐवेलांश भंजन होता है। उसे उस वोल्टेज का भंजन वोल्टेज कहते हैं।
ऐवेलांश भंजन —
अथवा p-n संधि की उत्क्रम अभिनत में यदि लगाए गए उत्क्रम विभव को बहुत अधिक बढ़ा दें तो विभव के एक निश्चित मान पर संधि के निकट सहसंयोजक बंध टूट जाते हैं। अतः उत्क्रम धारा बहुत तेजी से बढ़ती है। यह घटना एवं ऐवेलांश भंजन कहलाती है।
p-n सन्धि डायोड तरंग दिष्टकारी के रूप में —
एक ऐसा उपकरण जो प्रत्यावर्ती वोल्टता को दृष्टि वोल्टता में रूपांतरित करता है दस्तकारी कहलाता है अर्थात दस्तकारी एक ऐसा उपकरण होता है जो प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टता को दिष्ट धारा या वोल्टता में बदल देता है अर्थात परिवर्तित कर देता है वह प्रक्रिया जिसमें प्रत्यावर्ती वोल्टता को डिस्टर्ब बोलना में बदल जाता है डिस्ट कारण कहलाती है अर्थात जिला कारण एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें हम प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टता को दिष्ट धारा या वोल्टता में परिवर्तित कर देते हैं जो उपकरण प्रत्यावर्ती पुत्र को डिस्टर्ब बोलना में परिवर्तित करता है उसे दस्तकारी कहते हैं तथा इस प्रक्रिया को दृष्टीकरण या दृष्टि कारण कहते हैं।
हम जानते हैं कि पीएम संधि डायोड आगरा अभिनीत में धारा प्रवाहित होने देता है जबकि फर्स्ट अभिनव में धारा प्रवाहित नहीं होती है या नगर या धारा प्रवाहित होती है हम एक ऐसे डायोड का प्रयोग करेंगे जो अग्रवाल में तो अपने में से धारा प्रवाहित होने दे और स्पष्ट बायस में अपने में से धारा प्रवाहित ना होने दे या बहुत कम मां की नगरी धारा प्रवाहित होने दे यहां हम बहुत कम मां वाली धारा को सुन ही मन कर चलेंगे डायोड के इसी गुण को एक डिसेनियम गुण कहते हैं एक दिशा में अपने में से धारा प्रवाहित होने देता है तथा दूसरी दिशा में धारा प्रवाहित नहीं होने देता है इसी इकघ्षीय गन का उपयोग दस्तकारी उपकरण बनाने में किया जाता है।
दस्तकारी के प्रकार
दस्तकारी दो प्रकार के होते हैं अर्ध तरंग दस्तकारी पूर्ण तरंग दस्तकारी
वह प्रक्रिया जिसमें प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज को सीधे दिष्ट धारा या वोल्टेज में बदला जाता है। उस प्रक्रिया को दिष्टकरण या दिष्टीकरण कहते हैं। दिष्टकरण करने के लिए जिस यन्त्र का उपयोग होता है। उस उपकरण को दिष्टकारी कहते हैं। दिष्टकारी दो प्रकार के होते हैं (1) अर्द्धतरंग दिष्टकारी (2) पूर्णतरंग दिष्टकारी।
(1) p-n सन्धि डायोड अर्द्धतरंग तरंग दिष्टकारी के रूप में —
अर्द्धतरंग तरंग दिष्टकारी —
प्रत्यावर्ती वोल्टता आवर्ती रूप से धनात्मक तथा ऋणात्मक होती है। ऐसा दिष्टकारी जो प्रत्यावर्ती वोल्टता के आधे चक्र को ही दिष्ट वोल्टता में बदलता है अर्धतरंग दिष्टकारी कहलाता है।
संरचना –
अर्द्धतरंग तरंग दिष्टकारी में उच्चाई ट्रांसफार्मर की दो कुंडलियाँ लगी होती हैं। प्राथमिक कुंडली P_1 P_2 व द्वितीयक कुंडली S_1 S_2. एक उच्चाई ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुंडली के सिरों P_1 व P_2 को एक प्रत्यावर्ती निवेशी वोल्टता स्रोत V_i जोड़ देते हैं। इसकी द्वितीयक कुंडली के S_1 सिरे को एक p-n सन्धि डायोड D के p सिरे से जोड़ देते हैं। p-n सन्धि डायोड D के n सिरे को एक लोड प्रतिरोध R_L से संयोजित कर देते हैं। इस लोड प्रतिरोध के सिरों पर निर्गत वोल्टेज V_0 प्राप्त कर लिया जाता है।
वह जो यन्त्र निवेशी प्रत्यावर्ती धारा के केवल अर्द्धचक्र को दिष्टकरण करता है। उस यन्त्र को अर्द्धतरंग दिष्टकारी कहते हैं तथा इस प्रक्रिया को अर्द्धतरंग दिष्टकरण कहते हैं।
क्रियाविधि —
निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के पहले धनात्मक अर्द्धचक्र के दौरान जब द्वितीयक कुंडली का S1 सिरा धनात्मक तथा S2 सिरा ऋणात्मक होता है तो सन्धि डायोड अग्र अभिनत होता है। अतः इस अवस्था में डायोड धारा अनुमत करता है और लोड प्रतिरोध RL के सिरों के बीच धारा C से D की ओर बहने लगती है। निवेशी वोल्टेज के दूसरे ऋणात्मक अर्द्धचक्र के दौरान जब कुण्डली का S1 सिरा ऋणात्मक तथा S2 सिरा धनात्मक होता है तो सन्धि डायोड उत्क्रम अभिनत होता है। इसलिए डायोड धारा अनुमत नहीं करता है। अतः इस अवस्था में लोड प्रतिरोध RL के सिरों के बीच कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है। यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है जिससे निर्गत धारा निवेशी वोल्टेज के धनात्मक अर्द्धचक्र से ही उत्पन्न होती है।
चूंकि निवेशी वोल्टेज के केवल अर्द्धचक्र में, निर्गत वोल्टेज प्राप्त होता है। अतः इस यन्त्र को अर्द्धतरंग दिष्टकारी तथा इस प्रक्रिया को अर्द्धतरंग दिष्टकरण कहते हैं।
Note: एक अकेला डायोड अर्द्धतरंग दिष्टकारी के रूप में कार्य करता है।
(ii) p-n सन्धि डायोड पूर्णतरंग तरंग दिष्टकारी के रूप में —
पूर्णतरंग तरंग दिष्टकारी —
वह जो यन्त्र निवेशी प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज के पूर्ण चक्र/भाग को दिष्टकरण करता है। उस यन्त्र को पूर्णतरंग दिष्टकारी कहते हैं तथा इस प्रक्रिया को पूर्णतरंग दिष्टकरण कहते हैं।
संरचना —
इसमें ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुंडली को एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जोड़ दिया जाता है तथा द्वितीयक कुंडली से दो p-n संधि डायोड D1 व D2 जोड़ दिए जाते हैं। इसमें p क्षेत्र को एक दूसरे से जोड़ देते हैं तथा n क्षेत्र को भी आपस में जोड़ देते हैं। एक लोड प्रतिरोध RL को द्वितीयक कुंडली के केंद्रीय निष्कासन T तथा n क्षेत्र के बीच जोड़ दिया जाता है।
कार्यविधि —
निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के पहले अर्द्धचक्र में, द्वितीयक कुंडली का सिरा A, B के सापेक्ष धनात्मक होता है। तब संधि डायोड D1 अग्र दिशिक होता है। इस स्थिति में D1 से धारा C से D की ओर बहने लगती है। जबकि D2 पश्च दिशिक होने से D2 में धारा प्रवाह शून्य होता है। इसी प्रकार निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दूसरे अर्द्धचक्र में, द्वितीयक कुंडली का सिरा A, B के सापेक्ष ऋणात्मक होता है। तब संधि डायोड D2 अग्र दिशिक होता है। इस स्थिति में D2 में धारा C से D की ओर बहने लगती है। जबकि D1 पश्च दिशिक होने से डी में धारा प्रवाह शून्य होता है। इस प्रकार निवेशी वोल्टेज के दोनों अर्द्धचक्रों के दौरान डायोड D1 व D2 बारी बारी से धारा चालन करते हैं।
चूंकि निवेशी वोल्टेज के पूरे चक्र में, निर्गत वोल्टेज प्राप्त होता है। अतः इस यन्त्र को पूर्णतरंग दिष्टकारी तथा इस प्रक्रिया को पूर्णतरंग दिष्टकरण कहते हैं।
Note: अतः दो डायोड पूर्णतरंग दिष्टकारी के रूप में कार्य करते हैं।
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