5 जीवन की मौलिक इकाई | हिंदी में नोट्स | Ncert science class 9th UP board chapter 5 notes in Hindi.

5 जीवन की मौलिक इकाई | हिंदी में नोट्स | Ncert science class 9th UP board chapter 5 notes in Hindi

3 अध्याय विज्ञान कक्षा 9 (जीवन की मौलिक इकाई) में हम क्या सीखेंगे?

  • कोशिका : कोशिका की खोज 
  • एककोशिकीय व बहुकोशिकीय जीव : अन्तर 
  • कोशिका सिद्धांत 
  • कोशिकाओं की आकृति तथा परिमाप 
  • कोशिकाओं की सामान्य संरचना 
  • कोशिका के प्रकार 
  • कोशिका के भाग 
  • कोशिका भित्ति 
  • कोशिका झिल्ली 
  • अंतःद्रव्यी जालिका 
  • माइटोकांड्रिया 
  • लवक 
  • लाइसोसोम 
  • राइबोसोम 
  • रसधानियां 
  • तारककाय 
  • केन्द्रक 
  • केन्द्रक के कार्य 
  • पादप एवं जन्तु कोशिका में अन्तर

कोशिका —

कोशिका जीवन की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई होती है। किसी भी शरीर निर्माण में एक कोशिका से लेकर असंख्य छोटी-छोटी कोशिकाएं भाग लेती हैं। जिन जीवों में केवल एक कोशिका होती है, उन्हें एक कोशिकीय तथा जिन जीवों में अनेक कोशिकाएं होती हैं, उन्हें बहुकोशिकीय जीव कहते हैं। जैसे अमीबा एक कोशिकीय तथा मनुष्य बहुकोशिकीय हैं।

कोशिका की खोज -

कोशिका की खोज सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने सन 1665 में की। उन्होंने देखा कि कार्क की एक महीन काट में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियाँ देखीं। जिन्हें उन्होंने कोशिका (Cell ) नाम दिया। लैटिन भाषा में कोशिका का अर्थ “छोटा कैमरा” होता है।

एक कोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीव —

एक कोशिकीय जीव -

जिन जीवों में केवल एक कोशिका होती है अर्थात जिनका शरीर केवल एक कोशिका से बना होता है। उनको एक कोशिकीय जीव कहते हैं। जैसे- अमीबा, पैरामीशियम, क्लैमाइडोमोनास, जीवाणु आदि। एक कोशिकीय जीवों की सभी जैविक क्रियाएं केवल एक ही कोशिका द्वारा संपन्न होती हैं।

बहुकोशिकीय जीव -

जिन जीवों के शरीर में बहुत सी कोशिकाएं होती हैं अर्थात जिनका शरीर असंख्य कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। उनको बहुकोशिकीय जीव कहते हैं। इनमें कोशिकाएं मिलकर ऊतक बनाती हैं, ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं, और फिर अंग मिलकर अंग तंत्र बनाते हैं। जैसे- कवक, पादप एवं जन्तु।

एक कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय जीवो में अंतर -

एककोशिकीय जीव -

  1. जीव शरीर केवल एक कोशिका का ही बना होता है।
  2. एक कोशिकीय जीव की सभी जैविक क्रियाएं केवल एक कोशिका द्वारा संपन्न होती हैं।
  3. इनमें एक ही कोशिका होने के कारण श्रम विभाजन कोशिका स्तर पर नहीं होता है।
  4. एक कोशिका की क्षति होने पर जीव की मृत्यु हो जाती है।

बहुकोशिकीय जीव -

  1. शरीर अनेक कोशिकाओं का बना होता है।
  2. बहुकोशिकीय जीवों में प्रत्येक कोशिका मौलिक जीव क्रियाएं संपन्न करती है।
  3. इनमें कोशिकाएं श्रम विभाजन के कारण कार्य विशेष के संपादन हेतु अनुकूल होती हैं।
  4. एक कोशिका की क्षति का जीव पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है।

कोशिका सिद्धांत -

मेथियस जे श्लीडेन तथा थियोडेर श्वान ने सन 1838 में एक सिद्धांत प्रतिपादित किया। जिसे कोशिका सिद्धांत कहते हैं। इसके अनुसार —

  1. शरीर एक या अनेक कोशिकाओं का बना होता है तथा कोशिका शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई होती है।
  2. कोशिका में जैविक क्रियाएं जैसे- श्वसन, पाचन, उत्सर्जन आदि स्वतंत्र रूप से होती हैं।

कोशिका की आकृति एवं परिमाप -

विभिन्न प्रकार के जीवों में कोशिकाओं की आकृति विभिन्न प्रकार की होती है। जैसे- अंडाकार, बेलनाकार, दंडकार, बहुफलकीय, लंबी आदि। कोशिकाओं की आकृति तथा आकार उनके विशिष्ट कार्यों के अनुरुप होता है तथा बदलता रहता है। कोशिकाएं आकार में अति सूक्ष्म होती हैं। अतः इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखा जा सकता है। इनका व्यास 0.5 माइक्रोन से 20 माइक्रोन तक होता है। सबसे छोटी कोशिका माइक्रोप्लाज्मा लैडलैवी होती है। जिसका व्यास 0.1 माइक्रोन होता है। सबसे बड़ी कोशिका शुतुरमुर्ग का अंडा होता है। जिसका व्यास 15 सेंटीमीटर होता है।

कोशिका की सामान्य संरचना -

सभी प्रकार की कोशिकाओं में एक महत्वपूर्ण जीवित तरल भरा रहता है। जिसे जीवद्रव्य (Protoplasm) कहते हैं। जन्तु कोशिका का जीवद्रव्य अपने चारों ओर से एक जीवित कला से घिरा होता है। जिसे कोशिका कला (cell membrane) कहते हैं। इनमें पास-पास स्थित कोशिकाओं का जीवद्रव्य डेस्मोसोम के द्वारा परस्पर संबंधित होता है। पादप कोशिकाओं में कोशिका कला के बाहर एक निर्जीव भित्ति होती है। जिसे कोशिका भित्ति (Cell Wall) कहते हैं। कोशिका भित्ति में अनेक छिद्र होते हैं जिनसे होकर एक कोशिका का जीवद्रव्य पास स्थित दूसरी कोशिकाओं के जीवद्रव्य से संबंधित होता है। इन संबंधों को प्लाज्मोडिसमाटा कहते हैं। सभी जीवों में जीवद्रव्य का नियंत्रण कोशिकाओं द्वारा किया जाता है। कोशिका के अन्दर केन्द्रक, माइटोकांड्रिया, गॉल्जीकाय, अन्तः प्रद्रव्यी जालिका, राइबोसोम, माइक्रोसोम आदि प्रमुख कोशिकांग होते हैं। केन्द्रक के अतिरिक्त कोशिका के अन्दर का संपूर्ण पदार्थ कोशिका द्रव्य कहलाता है।

कोशिका के प्रकार -

केन्द्रक की उपस्थिति एवं संरचना के आधार पर कोशिकाएं निम्नलिखित दो प्रकार की होती हैं।

  1. प्रोकैरियोटिक कोशिकाएं (असीम केन्द्रकीय)
  2. यूकैरियोटिक कोशिकाएं (ससीम केन्द्रकीय)

प्रोकैरियोटिक कोशिकाएं -

प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में सत्य केन्द्रक का अभाव होता है। इनका केन्द्रकीय पदार्थ DNA कोशिका द्रव्य के सीधे संपर्क में रहता है क्योंकि केन्द्रक कला विहीन होता है। जिसे आरम्भी केन्द्रक या न्यूक्लियाड कहते हैं। इनके कोशिका द्रव्य में विकसित कोशिकांग जैसे- लवक, गॉल्जीकाय, तारककाय, माइटोकांड्रिया, अन्तःद्रव्यी जालिका आदि नहीं होते हैं। इनमें 70s राइबोसोम पाया जाता है। इन कोशिकाओं में DNA, हिस्टोन नामक प्रोटीन से सम्बद्ध नहीं होता है। इनका आकार अति सूक्ष्म 1 से 10 माइक्रोमीटर होता है। जैसे- जीवाणु तथा हरित शैवाल की कोशिकाएं।

यूकैरियोटिक कोशिकाएं -

यूकेरियोटिक कोशिकाओं में कला युक्त पूर्ण विकसित केन्द्रक और इकाई भित्ति से गिरे विभिन्न कोशिकांग जैसे- हरित लवक, माइटोकांड्रिया, गॉल्जीकाय, अन्तःद्रव्यी जालिका आदि होते हैं। इनके केन्द्रक में एक या अधिक केन्द्रक होते हैं। इनमें 80S राइबोसोम पाया जाता है। इन कोशिकाओं में DNA, हिस्टोन नामक प्रोटीन से सम्बद्ध होता है। जैसे- सभी पादप एवं जन्तु कोशिकाएं (केवल जीवाणु एवं नील हरित शैवाल को छोड़कर), यूकैरियोटिक कोशिकाएं होती हैं।

यूकैरियोटिक कोशिकाओं के प्रकार -

यूकैरियोटिक कोशिकाएं दो प्रकार की होती हैं।

  1. पादप कोशिका (Plant Cell)
  2. जन्तु कोशिका (Animal Cell)

कोशिका के प्रमुख भाग -

एक पादप कोशिका के तीन प्रमुख भाग होते हैं।

  1. कोशिका भित्ति (cell wall)
  2. जीवद्रव्य (Protoplasm)
  3. रिक्तिकाएं या रसधानियां (Vacuoles)

जन्तु कोशिकाओं में कोशिका भित्ति का अभाव होता है। इनमें रितिकाएं आकार में छोटी तथा संख्या में अधिक होती हैं। जबकि पादप कोशिकाओं में रिक्तिकाएं आकार में बड़ी तथा संख्या में कम (एक या दो) होती हैं। दोनों में जीवद्रव्य एवं रिक्तिकाओं के कार्य समान होते हैं।

(1) कोशिका भित्ति -

यह एक निर्जीव संरचना है जो पादप कोशिका को चारो ओर से घेरे रहती है। इसका निर्माण कोशिका द्रव्य के स्रावित पदार्थों द्वारा होता है। यह मुख्यतः सेल्युलोज की बनी होती है। सेल्युलोज एक बहुत जटिल कार्बोहाइड्रेट है, जो पौधों को संरचनात्मक दृढ़ता प्रदान करता है। जब किसी पादप कोशिका को सांद्र विलयन में रखा जाता है तो परासरण द्वारा जल, कोशिका से बाहर सांद्र विलयन में जाने लगता है। जिसके कारण कोशिका झिल्ली सहित आन्तरिक पदार्थ संकुचित हो जाते हैं। इस घटना को जीव द्रव्य कुंचन (सिकुड़ना) कहते हैं।

कोशिका भित्ति के कार्य -

कोशिका भित्ति के महत्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं :

  1. यह कोशिका को निश्चित आकृति एवं आकार प्रदान करती है।
  2. कोशिका भित्ति कोशिका को यांत्रिक बल प्रदान करती है जो यांत्रिक चोट, रसायन व सूक्ष्म जीवों से कोशिका को सुरक्षा प्रदान करती है।
  3. यह अल्प परासी विलयन में कोशिका को फटने से बचाती है।

(2) जीवद्रव्य -

कोशिका के अन्दर उपस्थित समस्त जीवित पदार्थ को जीवद्रव्य कहते हैं। यह अत्यंत जटिल पदार्थ होता है। फोटोप्लाज्म का लगभग 60% से 70% भाग जल होता है। जिसमें जीवन के समस्त लक्षण पाए जाते हैं। जीवों में संचालित होने वाली संपूर्ण जैविक क्रियाएं इसी जीवद्रव्य द्वारा ही संचालित होती हैं। जूलियस हक्सले ने जीव द्रव को जीवन का भौतिक आधार कहा है। जब तक जीवद्रव है, तभी तक जीवन है। जीवद्रव्य के मृत्यु होते ही जीवन भी समाप्त हो जाता है।

जीवद्रव्य के अन्दर होने वाली जैविक क्रियाएं -

जीवद्रव्य के अन्दर होने वाली प्रमुख जैविक क्रियाएं निम्नलिखित हैं।

  1. जीवद्रव्य में ब्राउनी गति पाई जाती है।
  2. जीवद्रव्य विभिन्न पोषक पदार्थ के स्वांगीकरण से अपनी मात्रा में वृद्धि करता है। जिसके फलस्वरुप कोशिका विभाजित होकर अपनी संख्या में वृद्धि करती है।
  3. जीव द्रव्य में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं में बनने वाले उत्सर्जी पदार्थ जीवद्रव्य द्वारा ही बाहर निकल जाते हैं।
  4. जीवद्रव्य में बाहर उद्दीपनों को ग्रहण करने की क्षमता होती है।
  5. जीवद्रव्य के द्वारा ही जीवधारी स्वयं को परिस्थितियों से अनुकूल करने में समर्थ होता है तथा जीवन संघर्ष में सफल होता है।

जीवद्रव्य के भाग -

जीवद्रव्य के दो प्रमुख भाग होते हैं।

  1. कोशिका द्रव्य
  2. केन्द्रक

(A) कोशिका द्रव्य -

कोशिका में केन्द्रक के बाहर स्थित कोशिका का संपूर्ण पदार्थ, कोशिका द्रव्य कहलाता है। कोशिका द्रव्य में अनेक प्रकार के कोशिकांग होते हैं। कोशिका द्रव्य में अनेक जीवित संरचनाओं होती हैं, जो विभिन्न क्रियाओं को संपन्न करती हैं। इन संरचनाओं को कोशिकांग कहते हैं।

कोशिकांग के प्रकार -

प्रमुख कोशिकांग निम्न प्रकार के हैं:

  1. कोशिका कला
  2. अन्तःद्रव्यी जालिका
  3. माइटोकांड्रिया
  4. लवक
  5. गॉल्जीकाय
  6. लाइसोसोम
  7. राइबोसोम
  8. राजधानियां
  9. तारककाय

(1) कोशिका कला या कोशिका झिल्ली -

कोशिका कला को जीवद्रव्य कला या प्लाज्मालेमा कहते हैं। यह रचना पौधों तथा जन्तुओं दोनों में पाई जाती है। पादप कोशिकाओं में यह कोशिका भित्ति के ठीक बाहर स्थित होती है। जबकि जन्तु कोशिकाओं में यह कोशिका का सबसे बाहरी आवरण बनाती है। इसकी मोटाई लगभग 75A° होती है।

कोशिका कला के कार्य -

यह विभिन्न पदार्थों के कोशिकाओं में आवरण प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। यह कुछ ही पदार्थों को अपने से होकर अन्दर बाहर आने जाने देती है। जबकि कुछ अन्य पदार्थों की गति को रोकती है। इसीलिए कोशिका झिल्ली को चयनात्मक या वर्णनात्मक झिल्ली भी कहते हैं।

पदार्थ कोशिका से बाहर कैसे आते हैं?

कुछ पदार्थ जैसे कार्बन डाइऑक्साइड अथवा ऑक्सीजन मिश्रण प्रक्रिया द्वारा कोशिका झिल्ली के आर पार आ-जा सकते हैं। पदार्थ की यह गति उच्च से निम्न सांद्रण की ओर होती है।

ऑक्सीजन में कोशिका के अन्दर CO_2 मुक्त होते रहने के कारण इसकी सान्द्रता बाह्य पर्यावरण की अपेक्षा अधिक होती है। इसी प्रकार कोशिका के अन्दर ऑक्सीजन क्रिया में O_2 का सदैव उपयोग होते रहने के कारण इसकी सान्द्रता बाह्य वातावरण की अपेक्षा कम होती है। अतः मिश्रण नियम के अनुसार CO_2 कोशिका के बाहर जाती रहती है तथा O_2 कोशिका के अन्दर प्रवेश करती रहती है।

जल भी विसरण नियमों के अनुसार व्यवहार करता है। वर्णनात्मक पारगम्य झिल्ली से होकर जल के अणुओं की गति को परासरण कहते हैं। कोशिका झिल्ली से होकर जल की गति इसमें घुले पदार्थ की मात्रा के कारण भी प्रभावित होती है। इस प्रकार जल के अणु उच्च जल की सान्द्रता से निम्न जल की सान्द्रता की ओर कोशिका झिल्ली से होकर गति करते हैं।

(2) अन्तःद्रव्यी जालिका -

यह नलिकाकार झिल्ली युक्त तन्त्र है। जो कोशिका के अधिकांश भागों को घेरे रहता है। इसे अन्तःद्रव्यी जालिका कहते हैं। बाहर की ओर यह तंत्र कोशिका कला से और अन्दर की ओर केन्द्रक कला से जुड़ा होता है। इसके कारण कोशिका छोटे-छोटे कोष्ठों में बट जाती है।

अन्तःद्रव्यी जालिका के प्रकार -

अतः द्रव्य जालिका दो प्रकार की होती हैं।

  1. चिकनी अन्तःद्रव्यी जालिका
  2. खुरदरी अन्तःद्रव्यी जालिका

(I) चिकनी अन्तःद्रव्यी जालिका -

इसकी सतह पर राइबोसोम कणिकाओं का अभाव होता है।

(II) खुरदरी अन्तःद्रव्यी जालिका -

इसकी सतह पर अनेक राइबोसोम चुपके होते हैं जिसके कारण इसकी सतह खुरदरी प्रतीत होती है।

अन्तःद्रव्यी जालिका के कार्य -

  1. अन्तःद्रव्यी जालिका के निम्नलिखित कार्य होते हैं:
  2. यह कोशिका को यांत्रिक ढांचा प्रदान करती है।
  3. यह कोशिका में होने वाली विभिन्न क्रियाओं के लिए अधिक पृष्ठीय सतह प्रदान करती है।
  4. यह कोशिका के अन्दर पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती है।
  5. कणिकामय में अन्तःद्रव्यी जालिका पर उपस्थित राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करते हैं।
  6. वसा, कोलेस्ट्रॉल, स्टेरॉयड इत्यादि के संश्लेषण में चिकनी अन्तःद्रव्यी जालिका सहायक होती है।
  7. जन्तुओं में यकृत कोशिकाओं में SER विष तथा दवाओं को निरविषीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(3) माइटोकांड्रिया -

प्रत्येक माइटोकांड्रिया अपने चारों ओर से दोहरी झिल्ली से घिरा होता है। इसकी बाहरी झिल्ली चिकनी होती है जबकि भीतरी झिल्ली अन्दर की ओर धंसकर अंगुली जैसी अनेक संरचनाओं बनाती है, जिन्हें क्रिस्टी कहते हैं। क्रिस्टी की सतह पर अनेक डंठल जैसी संरचनाओं लगी होती हैं जिन्हें ऑक्सीसोम कहते हैं। माइट्रोकांड्रिया की गुहा में अर्द्धतरल पदार्थ होता है, जिसे मैट्रिक्स कहते हैं। मैट्रिक्स में DNA, RNA, राइबोसोम एवं एंजाइम होते हैं।

माइटोकांड्रिया के कार्य -

माइटोकांड्रिया को कोशिका का बिजली घर कहते हैं, क्योंकि इसमें जीवन के लिए आवश्यक सभी रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए ऊर्जा का उत्पादन होता है। माइट्रोकांड्रिया के अन्दर ऑक्सी श्वसन के द्वारा ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से उर्जा उत्पन्न होती है, जो ATP के रूप में कोशिका के अन्दर संचित होती है। जब कोशिका को अपनी जैविक क्रिया के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, तो ATP में संचित ऊर्जा का उपयोग कर लिया जाता है।

(4) लवक -

यह पादप कोशिकाओं में पाए जाते हैं।

लवक के प्रकार -

लवक तीन मुख्य प्रकार के होते हैं।

I. हरित लवक 
II. अवर्णी लवक एवं 
III. वर्णी लवक 

(I) हरित लवक -

यह हरे रंग के लवक होते हैं। इनमें क्लोरोफिल नाम का हरे रंग का वर्णक होता है। हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) मुख्य रूप से पत्तियों तथा कोमल तनों व परिपक्व को फलों की बाह्य त्वचा में पाए जाते हैं। हरित लवक में उपस्थित वर्णक सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित करके प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण करता है।

(II) अवर्णी लवक (ल्यूकोप्लास्ट) -

ये रंगहीन लवक होते हैं और विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का संचय करते हैं। मण्ड का संचय करने वाले अवर्णी लवक को एमिलोप्लास्ट, प्रोटीन का संचय करने वाले लवक को एल्यूरोप्लास्ट तथा वसा या तेल का संचय करने वाले लवक को इलियोप्लास्ट कहते हैं।

वर्णी लवक (क्रोमोप्लास्ट) -

यह रंगीन होते हैं तथा पौधों के रंगीन भागों जैसे- पुष्पों की पंखुड़ियां तथा परिपक्व फलों की बाह्य त्वचा में पाए जाते हैं। रंगीन लवक फूलों को आकर्षक बनाकर कीट परागण में सहायता करते हैं।

लवक के कार्य -

तीनों प्रकार के लवक एक दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं। तीनों प्रकार के लवकों में हरित लवक अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन निर्माण करते हैं। इसीलिए इनको कोशिका का रसोईघर कहते हैं।

(5) गॉल्जीकाय -

कैमिलो गॉल्जी ने सन 1898 ईस्वी में गॉल्जी उपकरण को जन्तु कोशिका में देखा। यह एक कला युक्त कोशिकांग है। प्रत्येक गॉल्जी उपकरण चपटी और मुड़ी हुई कुंडलिकाओं का बना होता है यह कुंडिकाएं एक दूसरे के ऊपर समानांतर रूप से सजी रहती हैं। कुंडिकाओं का बाहरी भाग जालिकावत नलिकाओं का बना होता है। जिसमें पुत्तिकाएं होती हैं। जिसमें मैट्रिक्स भरा होता है। गॉल्जीकाय का सम्पर्क अन्तःद्रव्यी जालिका (E.R.) की झिल्लियों से होता है। E.R. में संश्लेषित पदार्थ गॉल्जी उपकरण में पहुंचते हैं, जहां से इन्हें कोशिका के बाहर तथा अन्दर विभिन्न क्षेत्रों में भेज दिया जाता है।

यह कर मुख्य रूप से गॉल्जी पुत्तिकाओं द्वारा होता है क्योंकि पुत्तिका में ही पदार्थ का संचय तथा रूपांतरण होता है। गॉल्जी के कोशिका विभाजन के समय कोशिका, प्लेट का निर्माण करती है। यह लाइसोसोम को भी बनाती है तथा आवश्यकता अनुसार सामान्य शर्करा से जटिल शर्करा का भी निर्माण करती हैं।

(6) लाइसोसोम -

यह एक झिल्ली युक्त कोशिकांग है तथा मुख्यतः जन्तु कोशिकाओं में पाए जाते हैं। ये पौधों में भी मिलते हैं। पौधों में ये केवल कुछ विशेष प्रकार की कोशिकाओं में ही उपस्थित होते हैं। स्तनियों की लाल रुधिर कोशिकाओं में इनका अभाव होता है, परंतु श्वेत रुधिर कोशिकाओं में यह प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इनके आकार तथा आकृति में अत्यधिक विविधता पाई जाती है। इनके अन्दर हाइड्रोलेज नामक पाचक एंजाइम प्रचुर मात्रा में होते हैं।

लाइसोसोम के कार्य -

यह कोशिका अपशिष्ट पदार्थों का निपटारण करता है। कोशिका में पहुंचे बाह्य पदार्थों तथा टूटे-फूटे कोशिकाओं को बचाकर यह कोशिका को साफ करता है। कोशिका में आने वाले बाह्य पदार्थ जैसे- जीवाणु अथवा भोजन तथा मृत एवं पुराने अंगक लाइसोसोम में चले जाते हैं। जहां इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया जाता है। कोशिकीय उपापचय में व्यवधान के कारण जब कोई कोशिका क्षतिग्रस्त या मृत्यु हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और एंजाइम अपनी ही कोशिकाओं को पाचित कर देते हैं। इसीलिए लाइसोसोम को कोशिका की आत्मघाती-थैली भी कहते हैं। ये सभी कार्य लाइसोसोम में उपस्थित शक्तिशाली पाचक एंजाइमों द्वारा होता है।

(7) राइबोसोम -

ये झिल्ली रहित अत्यंत सूक्ष्म कोशिकांग होते हैं जो अधिकांशतः अन्तःद्रव्यी जालिका की नलिकाओं में चिपके रहते हैं। राइबोसोम कोशिका द्रव्य में स्वतंत्र रूप में तैरते रहते हैं। ये राइबो न्यूक्लियो-प्रोटीन होते हैं अर्थात राइबो न्यूक्लिक अम्ल (RNA) तथा प्रोटीन से बने होते हैं। यह यूकैरियोटिक व प्रोकैरियोटिक दोनों प्रकार की कोशिकाओं में पाए जाते हैं। राइबोसोम का मुख्य कार्य प्रोटीन संश्लेषण है। इसीलिए इनका कोशिका की प्रोटीन निर्माण शाला कहते हैं।

राइबोसोम के प्रकार -

राइबोसोम दो प्रकार के होते हैं 70S तथा 80S । 70S राइबोसोम आकार में छोटे होते हैं। उनकी छोटी इकाई 30S तथा बड़ी इकाई 50S की होती है। ये जीवाणुओं, माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट तथा अन्य प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में मिलते हैं। 80S राइबोसोम कुछ बड़े आकार के होते हैं। उनकी छोटी इकाई 40S तथा बड़ी इकाई 60S होती है। 80S राइबोसोम केवल यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाए जाते हैं।

Note: यहां S का अर्थ अवसादन गुणांक से है। जिसे श्वेदवर्ग यूनिट कहते हैं।

(8) रसधानियां -

इनमें तरल एवं ठोस पदार्थों का संग्रह होता है। पादप कोशिकाओं में रसधानियां बड़े आकार की होती हैं, जबकि जन्तु कोशिकाओं में रसधानियां छोटे आकार की होती हैं। पौधों की कोशिकाओं में बड़ी रसधानियों के कारण केन्द्रक कोशिका द्रव्य में, कुछ किनारे स्थित होता है। कुछ पौधों की कोशिकाओं में केंद्रीय रसधानी की माप, कोशिका के आयतन का 50% से 90% तक होती है।

पादप कोशिकाओं की रसधानियों में तरल भरा होता है, जिसे रितिका रस कहते हैं। पौधों के लिए आवश्यक बहुत से पदार्थ जैसे- अमीनो अम्ल, शर्करा, प्रोटीन एवं विभिन्न कार्बनिक अम्ल रसधानी में ही स्थित होते हैं। कुछ जीवों में विशिष्ट रसधानियां पाई जाती हैं जो कोशिका से अतिरिक्त जल तथा कुछ अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालती हैं।

(9) तारककाय -

तारककाय प्रायः जन्तु कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में केन्द्रक के पास पाया जाता है। यह पादप कोशिकाओं में प्राय अनुपस्थित होता है। यह केवल कुछ कवक और शैवालों में ही पाया जाता है।

तारककाय के भाग -

प्रत्येक तारककाय के दो भाग (i) तारक परिकेन्द्र (ii) तारक केन्द्र होते हैं।

(i) तारक परिकेन्द्र -

तारक परिकेन्द्र बाहरी स्वच्छ रंगहीन घेरा है। जिसमें दो गोल तारक केन्द्र उपस्थित होते हैं। तारककाय कोशिका विभाजन के समय दो भागों में बढ़कर तर्कु के निर्माण में सहायता करता है। अतः यह कोशिका विभाजन में सहायक है।

(ii) तारक केन्द्र -

(B) केन्द्रक -

यह कोशिका द्रव्य से घिरा हुआ प्रायः गोल आकार का विशेष भाग होता है। सामान्यता एक कोशिका में एक ही केन्द्रक होता है। कुछ कोशिकाओं जैसे- स्तनधारी के RBCs में केन्द्रक नहीं होता है।

केन्द्रक के भाग -

केन्द्रक के चार मुख्य भाग होते हैं:

i. केन्द्रक कला 
ii. केन्द्र द्रव्य 
iii. केन्द्रिका
iv. क्रोमैटिन पदार्थ 

(i) केन्द्रक कला -

प्रत्येक केन्द्रक अपने चारों ओर से दोहरी झिल्ली से घिरा रहता है, जिसे केन्द्रक कला कहते हैं। इसकी दोनों परतें प्रोटीन एवं वसा की बनी होती हैं। बाहरी झिल्ली अनेक स्थानों पर अन्तःद्रव्यी जालिका से जुड़ी रहती है। केन्द्रक आवरण में जगह-जगह पर सूक्ष्म छिद्र होते हैं। इन छिद्रों द्वारा केन्द्रक द्रव और कोशिका द्रव्य के बीच विभिन्न पदार्थों का आदान-प्रदान होता रहता है।

(ii) केन्द्रक द्रव्य -

केन्द्र के अन्दर भरे पारदर्शी तरल पदार्थ को केन्द्रक द्रव्य कहते हैं। उचित रंगों से रंगने पर केन्द्रक द्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के रूप में दिखाई पड़ता है, जिसे क्रोमैटिन कहते हैं।

(iii ) केन्द्रिका -

केन्द्रक में प्रायः 1 से 3 स्पष्ट गोलाकार सघन रचनाएं होती हैं। जिन्हें केन्द्रिका कहते हैं। केन्द्रिका में प्रोटीन, RNA, DNA पाए जाते हैं। ये झिल्ली या किसी आवरण से नहीं घिरे होते हैं। इसका मुख्य कार्य राइबोसोम बनाना है। इसीलिए केन्द्रिका को राइबोसोम के उत्पादन की मशीन भी कहते हैं।

(iv) क्रोमैटिन पदार्थ -

केन्द्रक द्रव्य में सूक्ष्म तन्तुओं का एक जाल फैला होता है। जिन्हें क्रोमैटिन कहते हैं कोशिका विभाजन के समय यह तन्तु अपेक्षाकृत मोटे और स्पष्ट हो जाते हैं जिन्हें गुणसूत्र कहते हैं। मनुष्य के प्रत्येक कायिक कोशिका में 23 जोड़ी अर्थात 46 गुणसूत्र होते हैं। इनमें 22 जोड़ी गुणसूत्र नर तथा मादा में समान होते हैं। किंतु 23वां जोड़ा नर व मादा में अलग होता है। जिसे लिंग गुणसूत्र कहते हैं। क्रोमैटिन न्यूक्लियो प्रोटीन होते हैं जो मुख्यतः डी-ऑक्सीराइबोसोम न्यूक्लियक अम्ल (DNA) व प्रोटीन के बने होते हैं।

केन्द्रक के कार्य -

  1. केन्द्रक कोशिका का नियंत्रण केन्द्र है। यह कोशिका की सभी क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
  2. यह कोशिका विभाजन का नियंत्रण करता है।
  3. केन्द्रक में उपस्थित गुणसूत्र माता-पिता के आनुवांशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित करते हैं।

पादप एवं जन्तु कोशिका में अंतर 

पादप कोशिका -

  1. पादप कोशिका में प्लाज्मा झिल्ली के चारों ओर कोशिका भित्ति होती है।
  2. परिपक्व कोशिकाओं में एक धानी होती है।
  3. कोशिका द्रव्य में लवक होते हैं।
  4. सेंट्रोसोम व सेंट्रिओल अनुपस्थित होते हैं।
  5. गॉल्जी कॉम्प्लेक्स कम विकसित होता है इसे डिक्टियोसोम कहते हैं।
  6. पादप कोशिका में विभाजन के समय कोशिका के मध्य में एक प्लेट बनती है। यह अन्दर से बाहर की ओर बढ़ती है।

जन्तु कोशिका -

  1. जन्तु कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होती है।
  2. इस तरह की बड़ी धानियां नहीं होती हैं।
  3. लवक नहीं होते हैं।
  4. सेंट्रोसोम वह सेंट्रिओल उपस्थित होते हैं।
  5. गॉल्जी कॉम्प्लेक्स पूर्ण रूप से विकसित एवं स्पष्ट होता है।
  6. जन्तु कोशिका में विभाजन के समय एक खांच बनती है जो कोशिका को दो भागों में बांटती है। यह बाहर से अन्दर की ओर बढ़ती है।

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